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मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

महिलाएं सुरक्षित क्यों नहीं हैं...

दिल्ली में हुए 'गैंग रेप' के विरुद्ध जनाक्रोश चरम पर है। हर शहर में लोगों का आक्रोश दिख रहा है, जुलूस निकल रहे हैं। पर ऐसी घटनाये रोज किसी-न-किसी रूप में घटित हो रही हैं। कल इलाहाबाद में एक इंजीनियरिंग कालेज के स्टूडेंट्स ने चलती बस से बाइक पर जा रहे जोड़े के साथ बद्तमीजी की। विरोध करने पर बस से उतरकर इन भावी इंजीनियरों ने लड़के को जमकर पीटा और लड़की के साथ सरेआम बदसलूकी की। प्रशासन ने इस घटना के लिए बस चालक और परिचालक के विरुद्ध कार्यवाही की है। पर 'भावी इंजीनियर्स' का क्या करेंगें। ऐसे इंजीनियर्स के हाथ में देश का भविष्य कहाँ तक सुरक्षित है ?
 
 एक तरफ देश के कोने-कोने में गैंग-रेप जैसी घटनाओं के विरुद्ध जनाक्रोश है, वहीँ इस तरह की सरेआम घटनाएँ। क्या वाकई हुकूमत का भय लोगों के दिलोदिमाग से निकल गया है। प्रधानमंत्री जी अपनी तीन बेटियों और गृहमंत्री जी अपनी दो बेटियों की बात कर रहे हैं। पुलिस अफसर टी. वी. चैनल्स पर बता रहे हैं कि हमारी भी बेटियां हैं, अत: हमारी भी संवेदनाएं हैं। पर इन संवेदनाओं का आम आदमी क्या करे। कब तक मात्र सहानभूति और संवेदनाओं की बदौलत हम घटनाओं को विस्मृत करते रहेंगें।
 
लडकियाँ सड़कों पर असुरक्षित हैं, मानो वे कोई 'सेक्स आब्जेक्ट' हों। ऐसे में अब लड़कियों / महिलाओं को भी अपनी आत्मरक्षा के लिए खुद उपाय करने होंगें। अपने को कमजोर मानने की बजाय बदसलूकी करने वालों से भिड़ना होगा। पिछले दिनों इलाहबाद की ही एक लड़की आरती ने बदसलूकी करने वाले लड़के का वो हाल किया कि कुछेक दिनों तक शहर में इस तरह की घटनाये जल्दी नहीं दिखीं।
 
दुर्भाग्यवश,  दिल्ली में शोर है, बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं पर इन सबके बीच भय किसी के चेहरे पर भी नहीं है। तभी तो ऐसी घटनाओं की बारम्बार पुनरावृत्ति हो रही है। संसद मात्र बहस और प्रस्ताव पास करके रह जाती है, प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं हिंसा नहीं जायज है, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि, तो क्या हम कानून-व्यवस्था सुधारने हेतु वर्दी पहन लें।.......जब देश के जिम्मेदार पद पर बैठे लोगों का यह रवैया है तो भला कानून और शासन-प्रशासन का भय लोगों के मन में कहाँ से आयेगा। फांसी पर तो चढाने की बात दूर है, समाज में वो माहौल क्यों नहीं पैदा हो  पा  रहा है कि लड़कियां अपने को सुरक्षित समझें।
 

    

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

नहीं हूँ मैं माँस-मज्जा का एक पिंड

नहीं हूँ मैं माँस-मज्जा का एक पिंड
जिसे जब तुम चाहो जला दोगे
नहीं हूँ मैं एक शरीर मात्र
जिसे जब तुम चाहो भोग लोगे
नहीं हूँ मैं शादी के नाम पर अर्पित कन्या
जिसे जब तुम चाहो छोड़ दोगे
नहीं हूँ मैं कपड़ों में लिपटी एक चीज
जिसे जब तुम चाहो तमाशा बना दोगे।

मैं एक भाव हूँ, विचार हूँ
मेरा एक स्वतंत्र अस्तित्व है
ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारा
अगर तुम्हारे बिना दुनिया नहीं है
तो मेरे बिना भी यह दुनिया नहीं है।

फिर बताओं
तुम क्यों अबला मानते हो मुझे
क्यों पग-पग पर तिरस्कृत करते हो मुझे
क्या देह का बल ही सब कुछ है
आत्मबल कुछ नहीं
खामोश क्यों हो
जवाब क्यों नहीं देते.....?

(कृष्ण कुमार यादव जी के कविता-संग्रह 'अभिलाषा' से साभार)

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

12-12-12 का अद्भुत संयोग

 
12-12-12, सदी का एक अनुपम दिन है आज, पता नहीं यह संयोग फिर कब बने। इसी के साथ वर्ष 2012 भी अपने ढलान पर है। वर्ष 2013 का आगमन भी शीघ्र होने वाला है। यह वक़्त है विचार करने का कि हमने क्या खोया, क्या पाया। सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी।

कुछ लोग यह भी दावा कर रहे हैं कि 21 दिसंबर, 2012 को सृष्टि ख़त्म हो जाएगी। इससे पहले भी इस तरह की बातें चर्चा और अफवाहों में आईं और गुजर गयीं। वक़्त का पहिया तेजी से भाग रहा है। जरुरत है अपने अतीत से सबक लेने, आज को समझने और भविष्य को संवारने की। वर्ष 2012  में भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया में तमाम उथल-पुथल हुई है। आशा की जानी चाहिए कि वर्ष 2012 का अंत सुखद होगा और 2013 का भविष्य सुरक्षित होगा !!

सोमवार, 19 नवंबर 2012

छठि मईया आई न दुअरिया



भारतीय संस्कृति में त्यौहार सिर्फ औपचारिक अनुष्ठान मात्रभर नहीं हैं, बल्कि जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। त्यौहार जहाँ मानवीय जीवन में उमंग लाते हैं वहीं पर्यावरण संबंधी तमाम मुद्दों के प्रति भी किसी न किसी रूप में जागरूक करते हैं। सूर्य देवता के प्रकाश से सारा विश्व ऊर्जावान है और इनकी पूजा जनमानस को भी क्रियाशील, उर्जावान और जीवंत बनाती है। भारतीय संस्कृति में दीपावली के बाद कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला छठ पर्व मूलतः भगवान सूर्य को समर्पित है। माना जाता है कि अमावस्या के छठवें दिन ही अग्नि-सोम का समान भाव से मिलन हुआ तथा सूर्य की सातों प्रमुख किरणें संजीवनी वर्षाने लगी। इसी कारण इस दिन प्रातः आकाश में सूर्य रश्मियों से बनने वाली शक्ति प्रतिमा उपासना के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। वस्तुतः शक्ति उपासना में षष्ठी कात्यायिनी का स्वरूप है जिसकी पूजा नवरात्रि के छठवें दिन होती है। छठ के पावन पर्व पर सौभाग्य, सुख-समृद्धि व पुत्रों की सलामती के लिए प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य नारायण की पूजा की जाती है। आदित्य हृदय स्तोत्र से स्तुति करते हैं, जिसमें बताया गया है कि ये ही भगवान सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरूण हैं तथा पितर आदि भी ये ही हैं। वैसे भी सूर्य समूचे सौर्यमण्डल के अधिष्ठाता हैं और पृथ्वी पर ऊर्जा व जीवन के स्रोत कहा जाता है कि सूर्य की साधना वाले इस पर्व में लोग अपनी चेतना को जागृत करते हैं और सूर्य से एकाकार होने की अनुभूति प्राप्त कर आनंदित होते है।

छठ पर्व के प्रारंभ के बारे में कई किंवदंतियाँ हैं। मान्यता है कि इस पर्व का उद्भव द्वापर युग में हुआ था। भगवान कृष्ण की सलाह पर सर्वप्रथम कुन्ती ने अपने पुत्र पाण्डवों के लिए छठ पर्व पर व्रत लिया था, ताकि पाण्डवों का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवाश कष्टमुक्त गुजरे। इस मान्यता को इस बात से भी बल मिलता है कि कुन्ती पुत्र कर्ण सूर्य का पुत्र था। इसी प्रकार जब पाण्डव जुए में अपना सब कुछ हार गए और विपत्ति में पड़ गये, तब द्रौपदी ने धौम्य ऋषि की सलाह पर छठ व्रत किया। इस व्रत से द्रौपदी की कामनाएं पूरी हुईं और पाण्डवों को उनका खोया राजपाट वापस मिला गया। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम और सीताजी ने भी सूर्य षष्ठी के दिन पुत्ररत्न की प्राप्ति के लिए सूर्य देवता की आराधना की थी, जिसके चलते उन्हें लव-कुश जैसे तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। माँ गायत्री का जन्म भी सूर्य षष्ठी को ही माना जाता है। यही नहीं इसी दिन महर्षि विश्वामित्र के मुख से गायत्री मंत्र निकला था। एक अन्य मत के अनुसार छठ व्रत मूलतः नागकन्याओं से जुड़ा है। इसके अनुसार नागकन्याएं प्रतिवर्ष कश्यप ऋषि के आश्रम में कार्तिक षष्ठी को सूर्य देवता की पूजा करती थीं। संजोगवश एक बार च्यवन ऋषि की पत्नी सुकन्या भी वहाँ पहुँच गई, जिनके पति अक्सर अस्वस्थ रहते थे। नागकन्याओं की सलाह पर सुकन्या ने छठ व्रत उठाया और इसके चलते च्यवन ऋषि का शरीर स्वस्थ और सुन्दर हो गया।

छठ से जुड़ी एक अन्य प्रचलित मान्यता कर्तिकेय के जन्म से संबंधित है। मान्यता है कि भगवान शिव हिमवान की छोटी कन्या उमा के साथ पाणिग्रहण के उपरान्त रति-क्रीड़ा में मग्न हो गये। क्रीड़ा-विहार में सौ दिव्य वर्ष बीत जाने पर भी कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई। इतनी दीर्घावधि के पश्चात भगवान शिव के रूद्र तेज को सहन करेगा, इससे भयभीत होकर सभी देवगण उनकी प्रार्थना करने लगे- हे प्रभु।़ आप हम देवों पर कृपा करें और देवी उमा के साथ रति-क्रीड़ा से निवृत्त होकर तप में लीन हों । इस बीच निवृत क्रिया में सर्वोत्तम तेज स्खलित हो गया जिसे अग्नि ने अंगीकार किया। गंगा ने इस रूद्र तेज को हिमालय पर्वत के पाश्र्वभाग में स्थापित किया जो कान्तिवान बालक के रूप में प्रकट हुआ। इन्द्र, मरूत एवं समस्त देवताओं ने बालक को दूध पिलाने तथा लालन-पालन के लिए छह कृतिकाओं को नियुक्त किया। इन कृतिकाओं के कारण ही यह बालक कर्तिकेय के नाम से प्रसिद्ध हुए। ये छह कृतिकाएं छठी मइया का प्रतीक मानी जाती हैं। तभी से महिलाएं तेजस्वी पुत्र और सुन्दर काया के लिए छठी मइया की पूजा करते हुए व्रत रखती हैं और पुरूष अरोग्यता और समृद्धि के लिए व्रत रखते हैं। बच्चों के जन्म की छठी रात को षष्ठी पूजन का विधान अभी समाज में है।
छठ पर्व की लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि यह पूरे चार दिन तक जोश-खरोश के साथ निरंतर चलता है। पर्व के प्रारम्भिक चरण में प्रथम दिन व्रती स्नान कर के सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, जिसे ‘नहाय खाय‘ कहा जाता है। वस्तुतः यह व्रत की तैयारी के लिए शरीर और मन के शु़िद्धकरण की प्रक्रिया होती है। मान्यता है कि स्वच्छता का ख्याल न रखने से छठी मइया रूष्ठ हो जाती हैं-कोपि-कोपि बोलेंली छठिय मइया, सुना महादेव/मोरा घाटे दुबिया उपरिज गइले, मकड़ी बसेढ़ लेले/हंसि-हंसि बोलेलें महादेव, सुना ए छठिय मइया/हम राउर दुबिया छिलाई देबों। इसी प्रकार घाटो पर वेदियाँ बनाते हुए महिलाएं गाती हैं-एक कवन देव पोखरा खनावेलें, पटिया बन्हावेलें रे/एक कवन देवी छठी के बरत कइलीं, कइसे जल जगाइबि रे/ए घाट मोरे छेके घटवरवा, दुअरे पियदवा लोग रे/एक कोरा मोरा छेक ले गनपति, कइसे जलजगइबि/एक रूपया त देहु घटवरवां, भइया ढेबुआ पियदवा लोग रे। प्रथम दिन सुबह सूर्य को जल देने के बाद ही कुछ खाया जाता है। लौकी की सब्जी, अरवा चावल और चने की दाल पारम्परिक भोजन के रूप में प्रसिद्ध है। दूसरे दिन छोटी छठ (खरना) या लोहण्डा व्रत होता है, जिसमें दिन भर निर्जला व्रत रखकर शाम को खीर रोटी और फल लिया जाता है। खीर नये चावल व नये गुड़ से बनायी जाती है, रोटी में शुद्ध देशी घी लगा होता है। इस दिन नमक का प्रयोग तक वर्जित होता है। व्रती नये वस्त्र धारण कर भोजन को केले के पत्ते पर रखकर पूजा करते हैं और फिर इसे खाकर ही व्रत खोलते हैं।

तीसरा दिन छठ पर्व में सबसे महत्वपूर्ण होता है। संध्या अघ्र्य में भोर का शुक्र तारा दिखने के पहले ही निर्जला व्रत शुरू हो जाता है। दिन भर महिलाएँ घरों में ठेकुआ, पूड़ी और खजूर से पकवान बनाती हैं। इस दौरान पुरूष घाटों की सजावट आदि में जुटते हैं। सूर्यास्त से दो घंटे पूर्व लोग सपरिवार घाट पर जमा हो जाते हैं। छठ पूजा के पारम्परिक गीत गाए जाते हैं और बच्चे आतिशबाजी छुड़ाते हैं। सूर्यदेव जब अस्ताचल की ओर जाते हैं तो महिलायें आधी कमर तक पानी में खड़े होकर अघ्र्य देती हैं। अघ्र्य देने के लिए सिरकी के सूप या बाँस की डलिया में पकवान, मिठाइयाँ, मौसमी फल, कच्ची हल्दी, सिंघाड़ा, सूथनी, गन्ना, नारियल इत्यादि रखकर सूर्यदेव को अर्पित किया जाता है और मन्नतें माँगी जाती हैं- बांस की बहंगिया लिये चले बलका बसवंा लचकत जाय/तोहरे शरणियां हे मोर बलकवा/हे दीनानाथ मोरे ललवा के द लंबी उमरिया। मन्नत पूरी होने पर कोसी भरना पड़ता है। जिसके लिए महिलाएँ घर आकर 5 अथवा 7 गन्ना खड़ा करके उसके पास 13 दीपक जलाती हैं। निर्जला व्रत जारी रहता है और रात भर घाट पर भजन-कीर्तन चलता है। छठ पर्व के अन्तिम एवं चैथे दिन सूर्योदय अघ्र्य एवं पारण में सूर्योदय के दो घंटे पहले से ही घाटों पर पूजन आरम्भ हो जाता है। सूर्य की प्रथम लालिमा दिखते ही ‘केलवा के पात पर उगलन सूरजमल‘, ‘उगी न उदित उगी यही अंगना‘ एवं ‘प्रातः दर्शन दीहिं ये छठी मइया‘ जैसे भजन गीतों के बीच सूर्यदेव को पुत्र, पति या ब्राह्मण द्वारा व्रती महिलाओं के हाथ से गाय के कच्चे दूध से अध्र्य दिलाया जाता है और सूर्य देवता की बहन माता छठ को विदाई दी जाती है। माना जाता है कि छठ मईया दो दिन पहले मायके आई थीं, जिन्हें पूजन-अर्चन के बाद ‘मोरे अंगना फिर अहिया ये छठी मईया‘ की भावना के साथ ससुराल भेज दिया जाता है। इसके बाद छठ मईया चैत माह में फिर मायके लौटती हैं। छठ मईया को ससुराल भेजने के बाद सभी लोग एक दूसरे को बधाई देते हैं और प्रसाद लेने के व्रती लोग व्रत का पारण करते हैं। व्रती की सेवा और व्रत की सामग्री का अपना अलग ही महत्व है। किसी गरीब को व्रत की सामग्री उपलब्ध कराने से व्रती के बराबर ही पुण्य मिलता है। इसी प्रकार यदि अपने घर के बगीचे में लगे फल को किसी व्रती को पूजा के लिए दिया जाता है, तो भी पुण्य मिलता है। यहाँ तक की व्रती की डलिया व्रत को वेदी तक पहुँचाकर, उसके कपड़े धुलकर भी पुण्य कमाया जाता है। व्रत रखने वाले घरों में माता की विदाई पर सफाई नहीं की जाती क्योंकि मान्यता है कि बेटी की विदाई या कथा आदि के बाद घरों में झाड़ू नहीं लगाई जाती।

मूलत: बिहार, झारखण्ड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी समाज का पर्व माना जाने वाला छठ अपनी लोकरंजकता और नगरीकरण के साथ गाँवों से शहर और विदेशों में पलायन के चलते न सिर्फ भारत के तमाम प्रान्तों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है बल्कि मारीशस, नेपाल, त्रिनिडाड, सूरीनाम, दक्षिण अफ्रीका, हालैण्ड, ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में भी भारतीय मूल के लोगों द्वारा अपनी छाप छोड़ रहा है- छठि मईया आई न दुअरिया। कहते हैं कि यह पूरी दुनिया में मनाया जाने वाला अकेला ऐसा लोक पर्व है जिसमें उगते सूर्य के साथ डूबते सूर्य की भी विधिवत आराधना की जाती है। यही नहीं इस पर्व में न तो कोई पुरोहिती, न कोई मठ-मंदिर, न कोई अवतारी पुरूष और न ही कोई शास्त्रीय कर्मकाण्ड होता है। आडम्बरों से दूर प्रत्यक्षतः प्रकृति के अवलंब सूर्य देवता को समर्पित एवं पवित्रता, निष्ठा व अशीम श्रद्धा को सहेजे छठ पर्व मूलतः महिलाओं का माना जाता है, जिन्हें पारम्परिक शब्दावली में ‘परबैतिन‘ कहा जाता है। पर छठ व्रत स्त्री-पुरूष दोनों ही रख सकते हैं। इस पर्व पर जब सब महिलाएं इकट्ठा होती हैं तो बरबस ही ये गीत गूँज उठते हैं- केलवा जे फरला घवध से, तो ऊपर सुगा मड़राय/तीरवा जो मरबो धनुष से, सुगा गिरे मुरछाय।

भारतीय संस्कृति में समाहित पर्व अन्ततः प्रकृति और मानव के बीच तादाद्म्य स्थापित करते हैं। जब छठ पर्व पर महिलाएँ गाती हैं- कौने कोखी लिहले जनम हे सूरज देव या मांगी ला हम वरदान हे गंगा मईया....... तो प्रकृति से लगाव खुलकर सामने आता है। इस दौरान लोक सहकार और मेल का जो अद्भुत नजारा देखने को मिलता है, वह पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों को भी कल्याणकारी भावना के तहत आगे बढ़ाता है। यह अनायास ही नहीं है कि छठ के दौरान बनने वाले प्रसाद हेतु मशीनों का प्रयोग वर्जित है और प्रसाद बनाने हेतु आम की सूखी लकडि़यों को जलावन रूप में प्रयोग किया जाता है, न कि कोयला या गैस का चूल्हा। वस्तुतः छठ पर्व सूर्य की ऊर्जा की महत्ता के साथ-साथ जल और जीवन के संवेदनशील रिश्ते को भी संजोता है।

-आकांक्षा यादव

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

पावन पर्व दीपावली का

 पावन पर्व  दीपावली का,
दीपों की बारात लाए।
बम, पटाखे, फुलझड़ी संग,
खुशियों की सौगात लाए।

तोरण द्वार पर सजे अल्पना,
ज्योति का पुंज -हार लाए।
खील-लड्डू का चढ़े प्रसाद,
दिलों में सबके प्यार लाए।

है शुभ मंगलकारी पर्व यह,
इस दिन अयोध्या राम आए।
जल उठी दीपों की बाती,
पुलकित मन पैगाम लाए।

अमावस्या का तिमिर चीरकर,
रोशनी का उपहार लाए।
चारों तरफ सजे रंगोली,
लक्ष्मी-गणेश भी द्वार आए।

शनिवार, 3 नवंबर 2012

ब्लागिंग ने दिलाया अवध सम्मान : उ.प्र. के मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित

(उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने 1 नवम्बर, 2012 को हमें (आकांक्षा यादव-कृष्ण कुमार यादव) ‘न्यू मीडिया एवं ब्लागिंग’ में उत्कृष्टता के लिए एक भव्य कार्यक्रम में ‘अवध सम्मान’ से सम्मानित किया. जी न्यूज़ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन ताज होटल, लखनऊ में किया गया था, जिसमें विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित किया गया. इस पर प्रस्तुत है डा. विनय शर्मा की एक रिपोर्ट-


जीवन में कुछ करने की चाह हो तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं। हिन्दी-ब्लागिंग के क्षेत्र में ऐसा ही रास्ता अखि़्तयार किया दम्पति कृष्ण कुमार यादव व आकांक्षा यादव ने। उनके इस जूनून के कारण ही आज हिंदी ब्लागिंग को आधिकारिक तौर पर भी विधा के रूप में मान्यता मिलने लगी है. इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने 1 नवम्बर, 2012 को इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव और उनकी पत्नी आकांक्षा यादव को ‘न्यू मीडिया एवं ब्लागिंग’ में उत्कृष्टता के लिए एक भव्य कार्यक्रम में ‘अवध सम्मान’ से सम्मानित किया गया. जी न्यूज़ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन ताज होटल, लखनऊ में किया गया था, जिसमें विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित किया गया, पर यह पहली बार हुआ जब किसी दम्पति को युगल रूप में यह प्रतिष्ठित सम्मान दिया गया. ब्लागर दम्पति को सम्मानित करते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जहाँ न्यू मीडिया के रूप में ब्लागिंग की सराहना की, वहीँ कृष्ण कुमार यादव ने अपने संबोधन में उनसे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिए जा रहे सम्मानों में ‘ब्लागिंग’ को भी शामिल करने का अनुरोध किया. आकांक्षा यादव ने न्यू मीडिया और ब्लागिंग के माध्यम से भ्रूण-हत्या, नारी-उत्पीडन जैसे मुद्दों के प्रति सचेत करने की बात कही. अन्य सम्मानित लोगों में वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी, चर्चित लोकगायिका मालिनी अवस्थी, ज्योतिषाचार्य पं. के. ए. दुबे पद्मेश, वरिष्ठ आई.एस. अधिकारी जय शंकर श्रीवास्तव इत्यादि प्रमुख रहे.

जीवन में एक-दूसरे का साथ निभाने की कसमें खा चुके कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव, साहित्य और ब्लागिंग में भी हमजोली बनकर उभरे हैं. कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग और हिन्दी-साहित्य में एक चर्चित नाम हैं, जिनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनके जीवन पर एक पुस्तक ’बढ़ते चरण शिखर की ओर’ भी प्रकाशित हो चुकी है। आकांक्षा यादव भी नारी-सशक्तीकरण को लेकर प्रखरता से लिखती हैं और उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव ने वर्ष 2008 में ब्लाग जगत में कदम रखा और 5 साल के भीतर ही सपरिवार विभिन्न विषयों पर आधारित दसियों ब्लाग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लागिंग की तरफ प्रवृत्त किया और अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ ब्लागिंग को भी नये आयाम दिये। कृष्ण कुमार यादव का ब्लॉग ‘शब्द-सृजन की ओर’ (http://www.kkyadav.blogspot.in/) जहाँ उनकी साहित्यिक रचनात्मकता और अन्य तमाम गतिविधियों से रूबरू करता है, वहीँ ‘डाकिया डाक लाया’ (http://dakbabu.blogspot.in/) के माध्यम से वे डाक-सेवाओं के अनूठे पहलुओं और अन्य तमाम जानकारियों को सहेजते हैं. आकांक्षा यादव अपने व्यक्तिगत ब्लॉग ‘शब्द-शिखर’ (http://shabdshikhar.blogspot.in/) पर साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों और विशेषत: नारी-सशक्तिकरण को लेकर काफी मुखर हैं.

इस दम्पति के ब्लागों को सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भरपूर सराहना मिली। कृष्ण कुमार यादव के ब्लाग ’डाकिया डाक लाया’ को 98 देशों, ’शब्द सृजन की ओर’ को 75 देशों, आकांक्षा यादव के ब्लाग ’शब्द शिखर’ को 68 देशों में देखा-पढ़ा जा चुका है. सबसे रोचक तथ्य यह है कि यादव दम्पति ने अभी से अपनी सुपुत्री अक्षिता (पाखी) में भी ब्लागिंग को लेकर जूनून पैदा कर दिया है. पिछले वर्ष ब्लागिंग हेतु भारत सरकार द्वारा ’’राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’’ से सम्मानित अक्षिता (पाखी) का ब्लाग ’पाखी की दुनिया' (http://pakhi-akshita.blogspot.in/)

बच्चों के साथ-साथ बड़ों में भी काफी लोकप्रिय है और इसे 98 देशों में देखा-पढ़ा जा चुका है।इसके अलावा इस ब्लागर दम्पति द्वारा ‘उत्सव के रंग’, ‘बाल-दुनिया’, ‘सप्तरंगी प्रेम’ इत्यादि ब्लॉगों का भी सञ्चालन किया जाता है.

इस अवसर पर उ.प्र. विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय, रीता बहुगुणा जोशी, प्रमोद तिवारी, केबिनेट मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव, अनुप्रिया पटेल, मेयर दिनेश शर्मा सहित मंत्रिपरिषद के कई सदस्य, विधायक, कार्पोरेट और मीडिया से जुडी हस्तियाँ, प्रशासनिक अधिकारी, साहित्यकार, पत्रकार, कलाकर्मी व खिलाडी इत्यादि उपस्थित रहे. आभार ज्ञापन जी न्यूज उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के संपादक वाशिन्द्र मिश्र ने किया.

-डा. विनय कुमार शर्मा
प्रधान संपादक-संचार बुलेटिन (अंतराष्ट्रीय शोध जर्नल)
448/119/76, कल्याणपुरी, ठाकुरगंज, चैक, लखनऊ-226003


गुरुवार, 1 नवंबर 2012

'तूफान' और 'महिलाएं'


आजकल 'सैंडी' और 'नीलम' की बड़ी चर्चा है. नाम की खूबसूरती पर मत जाइये,  ये वास्तव में तूफान हैं. हाल के अमेरिकी इतिहास के सबसे खतरनाक तूफान (हरिकेन) माने जाने वाले 'सैंडी' ने तबाही मचा रखी है तो भारत में 'नीलम' ने तबाही मचा रखी है. इससे पहले 'कटरीना' और 'इरीन' अमेरिका को भयाक्रांत चुके हैं। वहीं चक्रवाती तूफान 'नीलम' से पहले भारत में 'लैला' और 'आइला' तूफान कहर बरपा चुके हैं।.यहाँ पर एक बात गौर करने लायक है कि इन सभी तूफानों के नाम महिलाओं के नाम पर ही रखे गए हैं. तो क्या वैश्विक समाज नारी-शक्ति से इतना भयाक्रांत है कि तबाही मचाने वाले तूफानों के नाम खूबसूरत महिलाओं के नाम पर रखकर अपनी दमित इच्छा पूर्ति कर रहा है ? आस्ट्रेलियाई मौसम वैज्ञानिक क्लीमेंट वेग्री (1852 -1922 ) ने ट्रापिकल तूफानों को महिलाओं के नाम देने का चलन आरम्भ किया. इसी क्रम में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी नौसेना के जवानों और मौसम विज्ञानियों ने तूफानों को अपनी प्रेमिकाओं और पत्नियों के नाम से पुकारा। 1951 में अन्तराष्ट्रीय फोनेटिक वर्णमाला के अस्तित्व में आने के बाद कुछ समय के लिए इसे तूफानों के नामकरण का आधार बनाया गया, पर 1953 में अमेरिका ने इस नामकरण को अस्वीकार करते हुए फिर से महिलाओं के नाम पर ही तूफानों के नामकरण की परंपरा को आगे बढाया.
70 के दशक में जब पूरे विश्व में महिलाएं नारी-सशक्तिकरण की ओर अग्रसर रही थीं और सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही थीं, तब कहीं जाकर लोगों का ध्यान इस ओर गया कि मात्र महिलाओं के नाम पर खतरनाक तूफानों का नामकरण गलत है और इससे समाज में गलत सन्देश जाता है. 1978 में यह सुनिश्चित हुआ कि तूफानों के नामकरण हेतु पुरुष और महिला दोनों तरह के नामों का इस्तेमाल किया जायेगा और तदनुसार इस्टर्न नार्थ पैसिफिक स्टॉर्म लिस्ट में दोनों के नाम शामिल किये गए. 1979 में अटलांटिक और मैक्सिको की खाड़ी में उठने वाले तूफानों के नाम भी पुरुष और महिला दोनों के नाम पर रखे गए.भारतीय उपमहाद्वीप में यह चलन वर्ष 2004 से आरंभ हुआ।
1953 से अमेरिका का नेशनल हरिकेन सेंटर, ट्रापिकल तूफानों के नाम की घोषणा करता था पर अब तूफान का नामकरण विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) और यूनाइटेड नेशंस इकोनामिक एंड सोशल कमीशन फार एशिया एंड पेसिफिक (ईएससीएपी) द्वारा प्रभाव में लाई गई प्रक्रिया के तहत होता है। वस्तुत : नाम रखे जाने से मौसम विशेषज्ञों की एक ही समय में किसी बेसिन पर एक से अधिक तूफानों के सक्रिय होने पर भ्रम की स्थिति भी दूर हो गई। हर साल विनाशकारी तूफानों के नाम बदल दिए जाते है और पुराने नामों की जगह नए रखे जाते हैं। इससे किसी गड़बड़ी या भ्रम की सम्भावना नहीं रह जाती. विश्व मौसम संगठन द्वारा हर साल छ: वर्षों के लिए नामों की छ: सूची बनाई जाती है. प्रत्येक सूची में २१ नाम होते हैं. ये सूचियाँ रोटेशन और पुनर्चक्रण सिद्धांत पर कार्य करती हैं. अर्थात हर सातवें वर्ष में विशिष्ट सूची दोबारा प्रयोग करने के लिए उपलब्ध होती है, पर इसमें यह ध्यान रखा जाता है की ऐसे तूफानों के नाम फिर से न रखें जाएँ जिनसे लोगों की संवेदना आहत होती हो, क्योंकि कुछेक तूफान काफी तबाही का मंजर ला चुके होते हैं और दुबारा उनका नाम इस्तेमाल करना लोगों की भावनाओं को भड़का सकता है. यही कारण है कि विश्व मौसम संगठन और यूनाइटेड नेशंस इकोनामिक एंड सोशल कमीशन फार एशिया एंड पेसिफिक साल में एक बार बैठक कर चक्रवाती तूफान की आशंका और उसका सामना करने के लिए कार्य योजना पर विचार-विमर्श करते हैं। तूफानों का नाम इनके शुरू होने की जगह के नजदीकी बेसिन की मॉनीटरिंग बॉडी की सीजनल लिस्ट के मुताबिक तय होता है। विश्व मौसम संगठन विभिन्न देशों के मौसम विभागों को तूफानों का नाम रखने की जिम्मेदारी सौंपता है, ताकि तूफानों की आसानी से पहचान की जा सके. इसी क्रम में मौसम वैज्ञानिकों ने आसानी से पहचान करने और तूफान के तंत्र का विश्लेषण करने के लिए उनके नाम रखने की परंपरा शुरु की । अब तूफानों के नाम विश्व मौसम संगठन द्वारा तैयार प्रक्रिया के अनुसार रखे जाते हैं । बंगाल की खाडी़ और अरब सागर के उपर बनने वाले तूफानों के नाम वर्ष 2004 से रखे जा रहे हैं. भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) क्षेत्रीय विशेषीकृत मौसम केद्र होने की वजह से भारत के अलावा सात अन्य देशों बंगलादेश, मालदीव, म्यांमार, पाकिस्तान, थाईलैंड एवं श्रीलंका को मौसम संबंधी परामर्श जारी करता है। आईएमडी ने इन देशों से भी तूफानों के लिए नाम सुझाने को कहा। इन देशों ने अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम के अनुसार नामों की सूची दी है । पूर्वानुमान और चेतावनी जारी करने की खातिर विशिष्ट पहचान देने के उद्धेश्य से अब तक कुल 64 नाम सुझाए गए हैं, जिनमें से अब तक 24 का उपयोग किया जा चुका है । मसलन 'लैला' और 'नीलम' नाम नाम पाकिस्तान द्वारा सुझाया गया था ।
 
पर इस सच्चाई से तो नहीं नक्कारा जा सकता कि अब भी अधिकतर बड़े तूफानों के नाम महिलाओं के नाम पर ही पाए जाते हैं. 'सैंडी' नाम को भले ही मौसम विज्ञानी पुरुषवाचक कह रहे हों, पर यह नाम भी महिलाओं के ही करीब है. कई बार तो लगता है कि पुरुषवाचक आधार पर तूफानों के ऐसे नाम रखे जाते हैं, जिनसे महिलावाचक होने का भ्रम हो. नारी के लिए अक्सर कहा जाता है कि वह जब शांत होती है तो 'विनम्र व दयालु' होती है और जब रणचंडी का रूप धारण करती है तो 'तूफान' आते हैं, पर हमारे मौसम विज्ञानी अभी भी प्राय: हर खतरनाक तूफान का नामकरण महिलाओं के नाम पर ही करना चाहते हैं तो यह सोचनीय विषय है !!
-आकांक्षा यादव

बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

काश इंदिरा गाँधी को भी लड़की होती..


आज भारत की लौह-महिला कही जाने वाली इंदिरा गाँधी जी की पुण्य तिथि है. हम उनकी नीतियों से सहमत-असहमत हो सकते हैं, पर भारतीय राजनीति में उनके व्यक्तित्व को नज़र अंदाज़ करना संभव नहीं. वे नारी-सशक्तिकरण की प्रतीक थीं, जिनकी खुद की चाहत थी कि काश उनके यहाँ बेटी पैदा होती. उन्होंने अपनी इस भावना से अपने कई राजनैतिक सहयोगियों को अवगत कराया था कि उनकी एक पुत्री भी हो। इस बात का उल्लेख पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी अंग्रेजी पुस्तक 'योवर्स सिंसीयरली' में भी किया है। इसमें उन्होंने जिक्र किया है कि जब उन्हें पुत्री हुई तो उन्हें बधाई देते हुए इंदिरा गाँधी ने पत्र में लिखा था कि उनकी तमन्ना थी कि उन्हें भी एक लड़की होती।
आज इंदिरा गाँधी जी कि पुण्यतिथि है. वे एक ऐसी महिला थीं, जिनका लोहा भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया मानती है. आज हम महिला आरक्षण की बात कर रहे हैं, पर वे उस दौर में भारतीय राजनीति के शिखर पर थीं, जब दुनिया में महिलाओं का संसदीय प्रतिनिधित्व विरले ही मिलता था. काश, इंदिरा जी की कोई बेटी होती तो आज भारतीय राजनीति का चेहरा ही कुछ और होता !
 
पुण्य तिथि पर सादर नमन !!

रविवार, 28 अक्तूबर 2012

'चाँद पर पानी' : श्रेष्ठतम लेखन की दिशा में गतिमान हैं कवयित्री आकांक्षा

समीक्ष्य बाल काव्य-कृति ’चाँद पर पानी’ की रचनाकार आकांक्षा यादव की यह प्रथम बाल कृति बड़े मनोयोग से प्रस्तुत की गयी है। उद्योग नगर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस कृति में तीस बालोपयोगी कवितायें आद्यन्त तक प्रसारित हैं । ये बालमन की रुचि वाली हैं ही, इनके माध्यम से अल्पवयी पाठकों को पर्यावरण, पर्व, परिवेश, खेल, देशभक्ति, पशु-पक्षियों जैसे मानवेतर प्राणियों को तकनीकी के अतिरिक्त इलेक्ट्रानिक विषयों की भी जानकारी दी गई है।
 
  कृति की संज्ञा इसकी प्रथम रचना ’चाँद पर पानी’ पर ही आधारित है। इस लघु रचना में बाल मनोविज्ञान का संस्पर्श अपने चरम पर है। बड़ी सरलता से बालिका कहती है कि-
 
चाँद पे निकला पानी,
सुनकर हुई हैरानी।
बड़ी होकर जाऊँगी,
पीने चाँद पर पानी। (चाँद पर पानी, पृ.सं. 7)
 
इस कमोवेष अविश्वसनीय कल्पना से ही ऊर्जान्वित होकर वह महत्वाकांक्षायें गढ़ने लगती है, सांकेतिक रूप से कहती है-असंभव शब्द को हमें अब कोई नया अर्थ देना होगा। 'मैं भी बनूंगा सैनिक’ की प्रारंभिक पंक्तियों में दशकों पूर्व की बहुश्रृत कवि 'मां मुझे सैनिक बना दो/चाहता रणभूमि में जाना मुझे तलवार ला दो’ की अनुगँज पाठकों और श्रोताओं को पसंद आयेगी। रचना की आगे की पंक्तियों की रंजकता तथा मासूमियत कम हदयग्राही नहीं-
 
चुस्त वर्दी और लम्बे बूट,
उस पर पहनूं आर्मी सूट।
मेरी तुम नजर उतारना,
तुम्हें करूँगा मैं सैल्यूट। (मैं भी बनूंगा सैनिक, पृ.सं. 8)
 
’नटखट बंदर’ (पृ.सं. 13) तथा ’सूरज का संदेश’ रचनायें जीवन में परिश्रम, परोपकार की उपादेयता को रेखांकित करने के साथ-साथ सभी से सूर्य मानसिकता ग्रहण करने का आह्वान भी करती हैं। यथा-
 
जीवन में तुम सदा सभी के,
ज्ञान की ज्योति फैलाओ।
दूसरों के काम आकर,
परोपकारी कहलाओ। (सूरज का संदेश पृ.सं. 10)
 
आजकल के बच्चे बचपन से ही लैपटाप पर खेलने लगे है। ऐसे में लैपटाप के प्रति बाल आसक्ति उत्पन्न करने वाली कतिपय काव्य पंक्तियों का आस्वाद भी पाठक पसंद करेंगें-
 
लैपटाप पापा जी लाए,
हम सबके यह दिल को भाए।
खेल खिलाए, ज्ञान बढ़ाए,
नई-नई ये बात बताए।
 
‘की बोर्ड‘ से हो गई यारी,
‘माउस‘ की मैं करूँ सवारी।
‘मानीटर‘ पर सब है दिखता,
कितना प्यारा है यह रिश्ता। (लैपटाप, पृ.सं. 12)
 
कविता ’राखी का त्यौहार’, भाई और बहन के बीच दीर्घजीवी प्यार का वार्षिक पुनर्स्मरण है तो ’नव वर्ष का प्रथम प्रभात’ रचना में भी नववर्ष की पहली सुबह से लोक कल्याण की कामना की गई है-
 
नैतिकता के मूल्य गढ़ें,
अच्छी-अच्छी बातें पढें।
कोई भूखा पेट न सोए,
संपन्नता के बीज बोए।
ऐ नव वर्ष के प्रथम प्रभात,
 दो सबको अच्छी सौगात। (’नव वर्ष का प्रथम प्रभात’ पृ.सं. 20)
 
तीस बाल गीतों से सुसज्जित इस कृति इस कृति की लगभग सभी रचनायें सार्थकता की दृष्टि से उत्तमतर हैं। प्रत्येक को रुचिकर रेखाचित्रों से संबंलित करने के कारण किसी का भी मन उसे पढ़ना चाहेगा। मुझे विश्वास है कि यह कृति बच्चों और प्रौढ़ों के द्वारा समान रुचि से पढ़ी जायेगी।
 
कृति: चाँद पर पानी
 
कवयित्री: आकांक्षा यादव, टाइप 5 निदेशक बंगला, जी0पी0ओ0 कैम्पस, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद (उ.प्र.) - 211001
 
प्रकाशन वर्ष: 2012
 
मूल्य: रु. 35/-    पृष्ठ: 36
 
प्रकाशक : उद्योग नगर प्रकाशन, 695, न्यू कोट गांव, जी0टी0रोड, गाजियाबाद (उ.प्र.)
 
समीक्षक: डा. कौशलेन्द्र पाण्डेय, 130, मारुतीपुरम्, लखनऊ मो0: 09236227999
 
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डा. कौशलेन्द्र पाण्डेय : एक परिचय-
 
जन्म: 28 दिसंबर, 1937 .

शिक्षा : एम्. काम., एल.एल. बी. एवं विद्यावाचस्पति व विद्यासागर (मानद उपाधियाँ)

प्रकाशन : प्राय: सभी लब्धप्रतिष्ठ पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में रचनाओं का अनवरत प्रकाशन.
कृतियाँ : 7 कहानी एवं 5 काव्य-संग्रह सहित कुल 18 पुस्तकें प्रकाशित.

सम्मान : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 'साहित्य भूषण' सहित विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विभिन्न सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त.

सम्प्रति : स्वतंत्र अध्ययन व लेखन.

संपर्क : डा. कौशलेन्द्र पाण्डेय, 130, मारुतीपुरम्, लखनऊ (उ.प्र.). मो.: 09236227999
 
( साभार : डा. कौशलेन्द्र पाण्डेय जी द्वारा लिखित उपरोक्त समीक्षा हिंदी मीडिया इन और परिकल्पना ब्लागोत्सव पर भी पढ़ी जा सकती है. इसके अलावा यह यू. एस. एम्. पत्रिका () एवं डेली न्यूज एक्टिविस्ट (27 अक्तूबर, 2012) में भी प्रकाशित है. )

शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

अपूर्वा का ’बर्थ-डे’ है आया

आज 27 अक्तूबर, 2012 है. आज का दिन हमारे लिए खास मायने रखता है. आज ही के दिन हमारी प्यारी सी बिटिया अपूर्वा का जन्म हुआ था.

अपूर्वा का ’बर्थ-डे’ है आया,
सब बच्चे मिल करो धमाल।
जमके खूब खाओ तुम सारे,
हो जाओ फिर लाल-लाल।
हैप्पी ’बर्थ-डे’ मिलकर गाओ,
मस्ती करो और मौज मनाओ।
पाखी, तन्वी, खुशी, अपूर्वा,
सब मिलकर बैलून फुलाओ।
आईसक्रीम और केक भी खाओ,
कोई भी ना मुँह लटकाओ।

कितना प्यारा बर्थ-डे केक
हैप्पी बर्थ-डे मिलकर गाओ।

अपूर्वा तुम जियो हजारों साल,
साल के दिन हों पचास हजार ! 

आज अपूर्वा दो साल की हो गईं. अपूर्वा के जन्मदिन पर ढेरों बधाई, आशीर्वाद, स्नेह और प्यार. आपके आशीर्वाद और स्नेह की आकांक्षा बनी रहेगी !!
 

बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन है दशहरा


दशहरा पर्व भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा बेसब्री के साथ इंतजार किये जाने वाला त्यौहार है। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन "दश" व "हरा" से हुयी है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात रावण की मृत्यु रूप मंे राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है।
 
दशहरे से पूर्व हर वर्ष शारदीय नवरात्र के समय मातृरूपिणी देवी नवधान्य सहित पृथ्वी पर अवतरित होती हैं- क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री रूप में मां दुर्गा की लगातार नौ दिनांे तक पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के अंतिम दिन भगवान राम ने चंडी पूजा के रूप में माँ दुर्गा की उपासना की थी और मांँ ने उन्हें युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया था। इसके अगले ही दिन दशमी को भगवान राम ने रावण का अंत कर उस पर विजय पायी, तभी से शारदीय नवरात्र के बाद दशमी को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है और आज भी प्रतीकात्मक रूप में रावण-पुतला का दहन कर अन्याय पर न्याय के विजय की उद्घोषणा की जाती हेै।
 
दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। पर विजयदशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है।
 
 
आप सभी को विजयदशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !!

शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

300 पोस्ट के बाद प्रिंट-मीडिया में 'शब्द-शिखर' की 30वीं पोस्ट


नवरात्र पर 16 अक्तूबर, 2002 को 'शब्द-शिखर' पर लिखी गई मेरी पोस्ट 'आदिशक्ति' की पूजा, पर असली 'नारी' शक्ति मंजूर नही' को 19 अक्तूबर, 2012 को जनसत्ता के नियमित स्तम्भ 'समांतर' में 'देवी बनाम बेटी' शीर्षक से स्थान दिया है...आभार. पिछले दिनों अपने ब्लॉग 'शब्द-शिखर' पर मैंने 300 वीं पोस्ट लिखी और अब समग्र रूप में प्रिंट-मीडिया में 30वीं बार मेरी किसी पोस्ट की चर्चा हुई है.. आभार !!
 
इससे पहले शब्द-शिखर और अन्य ब्लॉग पर प्रकाशित मेरी पोस्ट की चर्चा दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला,राष्ट्रीय सहारा,राजस्थान पत्रिका, आज समाज, गजरौला टाईम्स, जन सन्देश, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में की जा चुकी है. आप सभी का इस समर्थन व सहयोग के लिए आभार! यूँ ही अपना सहयोग व स्नेह बनाये रखें !!
 

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

'आदिशक्ति' की पूजा, पर असली 'नारी' शक्ति मंजूर नहीं...

आज से नवरात्र के दिन आरंभ हो रहे हैं. नवरात्र मातृ-शक्ति का प्रतीक है। आदिशक्ति को पूजने वाले भारत में नारी को शक्तिपुंज के रूप में माना जाता है. नारी सृजन की प्रतीक है. हमारे यहाँ साहित्य और कला में नारी के 'कोमल' रूप की कल्पना की गई है. कभी उसे 'कनक-कामिनी' तो कभी 'अबला' कहकर उसके रूपों को प्रकट किया गया है. पर आज की नारी इससे आगे है. वह न तो सिर्फ 'कनक-कामिनी' है और न ही 'अबला', इससे परे वह दुष्टों की संहारिणी भी बनकर उभरी है. यह अलग बात है कि समाज उसके इस रूप को नहीं पचा पता. वह उसे घर की छुई-मुई के रूप में ही देखना चाहता है. बेटियाँ कितनी भी प्रगति कर लें, पुरुषवादी समाज को संतोष नहीं होता. उसकी हर सफलता और ख़ुशी बेटों की सफलता और सम्मान पर ही टिकी होती है. तभी तो आज भी गर्भवती स्त्रियों को ' बेटा हो' का ही आशीर्वाद दिया जाता है. पता नहीं यह स्त्री-शक्ति के प्रति पुरुष-सत्तात्मक समाज का भय है या दकियानूसी सोच.

नवरात्र पर देवियों की पूजा करने वाले समाज में यह अक्सर सुनने को मिलता है कि 'बेटा' न होने पर बहू की प्रताड़ना की गई. विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि बेटा-बेटी का पैदा होना पुरुष-शुक्राणु पर निर्भर करता है, न कि स्त्री के अन्दर कोई ऐसी शक्ति है जो बेटा या बेटी क़ी पैदाइश करती है. पर पुरुष-सत्तात्मक समाज अपनी कमजोरी छुपाने के लिए हमेशा सारा दोष स्त्रियों पर ही मढ़ देता है. ऐसे में सवाल उठाना वाजिब है क़ी आखिर आज भी महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह से क्यों ग्रस्त है पुरुष मानसिकता ? कभी लड़कियों के जल्दी ब्याह क़ी बात, कभी उन्हें जींस-टॉप से दूर रहने क़ी सलाह, कभी रात्रि में बाहर न निकलने क़ी हिदायत, कभी सह-शिक्षा को दोष तो कभी मोबाईल या फेसबुक से दूर रहने क़ी सलाह....ऐसी एक नहीं हजार बिन-मांगी सलाहें हैं, जो समाज के आलमबरदार रोज सुनाते हैं. उन्हें दोष महिलाओं क़ी जीवन-शैली में दिखता है, वे यह स्वीकारने को तैयार ही नहीं हैं कि दोष समाज की मानसिकता में है.

'नवरात्र' के दौरान अष्टमी के दिन नौ कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा रही है. लोग उन्हें ढूढ़ने के लिए गलियों की खाक छानते हैं, पर यह कोई नहीं सोचता कि अन्य दिनों में लड़कियों के प्रति समाज का क्या व्यवहार होता है। आश्चर्य होता है कि यह वही समाज है जहाँ भ्रूण-हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार जैसे मामले रोज सुनने को मिलते है पर नवरात्र की बेला पर लोग नौ कन्याओं का पेट भरकर, उनके चरण स्पर्श कर अपनी इतिश्री कर लेना चाहते हैं। आखिर यह दोहरापन क्यों? इसे समाज की संवेदनहीनता माना जाय या कुछ और? आज बेटियां धरा से आसमां तक परचम फहरा रही हैं, पर उनके जन्म के नाम पर ही समाज में लोग नाकभौं सिकोड़ने लगते हैं। यही नहीं लोग यह संवेदना भी जताने लगते हैं कि अगली बार बेटा ही होगा। इनमें महिलाएं भी शामिल होती हैं। वे स्वयं भूल जाती हैं कि वे स्वयं एक महिला हैं। आखिर यह दोहरापन किसके लिए ?
समाज बदल रहा है। अभी तक बेटियों द्वारा पिता की चिता को मुखाग्नि देने के वाकये सुनाई देते थे, हाल के दिनों में पत्नी द्वारा पति की चिता को मुखाग्नि देने और बेटी द्वारा पितृ पक्ष में श्राद्ध कर पिता का पिण्डदान करने जैसे मामले भी प्रकाश में आये हैं। फिर पुरूषों को यह चिन्ता क्यों है कि उनकी मौत के बाद मुखाग्नि कौन देगा। अब तो ऐसा कोई बिन्दु बचता भी नहीं, जहाँ महिलाएं पुरूषों से पीछे हैं। फिर भी समाज उनकी शक्ति को क्यों नहीं पहचानता? समाज इस शक्ति की आराधना तो करता है पर वास्तविक जीवन में उसे वह दर्जा नहीं देना चाहता। ऐसे में नवरात्र पर नौ कन्याओं को भोजन मात्र कराकर क्या सभी के कर्तव्यों की इतिश्री हो गई ....???
-आकांक्षा यादव

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

'शब्द-शिखर' पर 300 पोस्ट...

20 नवम्बर, 2008 का वो दिन अभी भी याद है...जब मैंने ब्लागिंग-जगत में कदम रखा था. देश भर की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित हो रही थी. साहित्य की दुनिया में अपना एक मुकाम बनाने की कोशिश कर रही थी, एक अच्छा-खासा पाठक-वर्ग और शुभ-चिंतकों का वर्ग था, जो न सिर्फ रचनाओं को पसंद करता था बल्कि प्रेरित भी करता था. ऐसे में जब हिंदी-ब्लागिंग के क्षेत्र में कदम रखा तो अंतर्जाल की दुनिया पर एक व्यापक स्पेस मिला. न संपादकों की स्वीकृति-अस्वीकृति का झंझट, प्रतिक्रियाओं के माध्यम से तत्काल ही गुण-दोष का विश्लेषण, कभी भी पढ़े जाने की सुविधा, 'कलम' की बजाय 'अँगुलियों' का कमाल और उस पर से एक नया पाठक-वर्ग. कृष्ण कुमार जी पहले से ही ब्लागिंग में सक्रिय थे, अत: तकनीकी पहलुओं को समझने-जानने में देर नहीं लगी. मुझे ब्लागिंग में सक्रिय करने में उनका संपूर्ण योगदान रहा, और उसके बाद मिली प्रतिक्रियाओं ने तो हौसला-आफजाई ही की. तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित पोस्ट को साभार प्रकाशित किया या उधृत किया. 'शब्द-शिखर' ब्लॉग की चर्चा डा. जाकिर अली रजनीश ने 12 अक्टूबर 2011 को 'जनसंदेश टाइम्स' में अपने साप्ताहिक स्तम्भ 'ब्लॉग वाणी' के तहत 'शब्द शिखर पर विराजने की आकांक्षा' शीर्षक के तहत विस्तारपूर्वक की. इस बीच कानपुर से लेकर अंडमान और अब इलाहाबाद तक के सफ़र में बहुत कुछ चीजें जुडती गई..नए-नए अनुभव, वक़्त के साथ परिष्कृत होती लेखनी, नए लोगों के साथ संवाद...!
 
मेरे लिए ब्लॉग सिर्फ जानकारी देने का माध्यम नहीं बल्कि संवाद, प्रतिसंवाद, सूचना, विचार और अभिव्यक्ति के सशक्त ग्लोबल मंच के साथ-साथ सामाजिक जनचेतना को भी ब्लागिंग से जोड़ना है. 'शब्द-शिखर' ब्लॉग पर मैंने अपनी साहित्यिक-रचनाधर्मिता के साथ-साथ समय-समय पर विभिन्न विषयों और सरोकारों पर बेबाकी से अपने विचार भी अभिव्यक्त किये. इस बीच ब्लागिंग पर तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुईं और उनमें मैंने अपने आलेखों/चर्चा द्वारा सहभागिता सुनिश्चित की. इसके अलावा भी तमाम पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों में हिंदी ब्लागिंग को लेकर मैंने लेखनी चलाई, ताकि अन्य लोग भी इस विधा से जुड़ सकें.
 
ब्लागिंग में मैं ही नहीं बल्कि पूरा परिवार ही सक्रिय है. कृष्ण कुमार जी, बेटी अक्षिता (पाखी)...अक्षिता को परिकल्पना समूह द्वारा 'श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर-2010' एवं आर्ट और ब्लागिंग के लिए भारत सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार-2011' से भी सम्मानित किया जा चूका है. हाल ही में ”परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान” के तहत हमें 27 अगस्त 2012 को लखनऊ में आयोजित द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन में “दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपत्ति (2003-2012)“ के ख़िताब से भी नवाजा गया. ये सम्मान जीवन में सुखद अहसास देते हैं, और कुछ नया करने की प्रेरणा भी.
 
'शब्द-शिखर' को आप सबका भरपूर स्नेह और समर्थन मिला और यही कारण है की अगले माह 4 वर्ष पूरे करने जा रहा यह ब्लॉग 300 पोस्टों का सफ़र पूरा कर चूका है. लगभग 68 देशों में देखे-पढ़े जाने वाले इस ब्लॉग का 272 जन अनुसरण कर रहे हैं. 30 सितम्बर, 2012 को इस ब्लॉग की 300वीं पोस्ट ''आकांक्षा यादव को 'हिंदी भाषा-भूषण' की मानद उपाधि'' शीर्षक से प्रकाशित हुई और 301वीं पोस्ट के रूप में ''हिंदी ब्लागिंग को समृद्ध करती महिलाएं" नामक आलेख प्रकाशित किया गया.
 
तीन शतक (300) के पोस्ट के क्रम में आप सभी का जो भरपूर प्रोत्साहन और स्नेह मिला..उस सबके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार !!

-आकांक्षा यादव

शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

हिन्दी ब्लागिंग को समृद्ध करती महिलाएं : आकांक्षा यादव


वर्तमान साहित्य में नारी पर पर्याप्त मात्रा में लेखन कार्य हो रहा है, पर कई बार यह लेखन एकांगी होता है। यथार्थ के धरातल पर आज भी नारी-जीवन संघर्ष की दास्तान है। नारी बहुत कुछ कहना चाहती है पर मर्यादाएं उसे रोकती हैं। कई बार ये अनकही भावनाएं डायरी के पन्नों पर उतरती हैं या साहित्य-सृजन के रूप में। पर न्यू मीडिया के रूप में उभरी ब्लागिंग ने नारी-मन की आकांक्षाओं को मानो मुक्ताकाश दे दिया हो। वर्ष 2003 में यूनीकोड हिंदी में आया और तदनुसार तमाम महिलाओं ने हिंदी ब्लागिंग में सहजता महसूस करते हुए उसे अपनाना आरंभ किया। आज 50,000 से भी ज्यादा हिंदी ब्लाग हैं और इनमें लगभग एक चौथाई ब्लाग महिलाओं द्वारा संचालित हैं। ये महिलाएं अपने अंदाज में न सिर्फ ब्लागों पर सहित्य-सृजन कर रही हैं बल्कि तमाम राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक मुददों से लेकर घरेलू समस्याओं, नारियों की प्रताड़ना से लेकर अपनी अलग पहचान बनाती नारियों को समेटते विमर्श, पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण से लेकर पुरूष समाज की नारी के प्रति दृष्टि, जैसे तमाम विषय ब्लागों पर चर्चा का विषय बनते हैं।

हिंदी ब्लागिंग ने महिलाओं को खुलकर अपनी बात रखने का व्यापक मंच दिया है। तभी तो ब्लाॅगिंग का दायरा परदे की ओट से बाहर निकल रहा है। इनमें प्रशासक, डाक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, विद्यार्थी, पर्यावरणविद, वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, समाजसेवी, साहित्यकार, कलाकार, संस्कृतिकर्मी, रेडियो जाकी से लेकर सरकारी व कारपोरेट जगत तक की महिलाएं शामिल हैं। कामकाजी महिलाओं के साथ-साथ गृहिणियां भी इसमें खूब हाथ आजमा रही हैं। महिलाओं में हिन्दी ब्लागिंग आरम्भ करने का श्रेय इन्दौर की पद्मजा को है, जिन्होंने वर्ष 2003 में ‘कही अनकही‘ ब्लाग के माध्यम से इसकी शुरूआत की। पद्मजा उस समय ‘वेब दुनिया‘ में कार्यरत थीं। फिलहाल पद्मजा का यह ब्लाग अन्तर्जाल पर उपलब्ध नहीं है और उसे उन्होंने हटा दिया है। फिर भी इसे इंटरनेट आर्काइव पर देखा जा सकता है-http://web.archive.org/web/*/http://padmaja.blogspot.com/ आरंभिक हिंदी महिला ब्लागरों में पूर्णिमा वर्मन, प्रत्यक्षा सिन्हा, रचना बजाज, सारिका सक्सेना, सुजाता, नीलिमा, रत्ना, दीना मेहता, निधि श्रीवास्तव, मानोषी चटर्जी, रचना, डा. कविता वाचक्नवी इत्यादि का नाम लिया जा सकता है।
 
ब्लागिंग में हर क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं अपनी अभिव्यक्तियों को विस्तार दे रही हैं, अतः इनका दायरा भी व्यापक है। ये ब्लॉग सिर्फ साहित्यिक गतिविधियों- कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, आप-बीती, निबंध इत्यादि को ही प्राण वायु नहीं दे रहे हैं, बल्कि महिला ब्लागर्स समसामयिक मुद्दों से लेकर राजनैतिक-सामाजिक परिप्रेक्ष्य, भ्रष्टाचार, मंहगाई, पर्यावरण, धार्मिक विश्वास, खान-पान, संगीत, ज्योतिषी इत्यादि तक पर प्रखरता से लिख रही हैं। कभी अस्तित्ववादी विचारों की पोषक सीमोन डी बुआ ने ‘सेकेण्ड सेक्स’ में स्त्रियों के विरूद्ध होने वाले अत्याचारों और अन्यायों का विश्लेषण करते हुए लिखा था कि-“पुरूष ने स्वयं को विशुद्ध चित्त (Being-for- itself : स्वयं में सत्) के रूप में परिभाषित किया है और स्त्रियों की स्थिति का अवमूल्यन करते हुए उन्हें “अन्य” के रूप में परिभाषित किया है व इस प्रकार स्त्रियों को “वस्तु” रूप में निरूपित किया गया है।’’ कहीं-न-कहीं आधुनिक समाज में भी यह प्रवृत्ति मौजूद है और ऐसे में ब्लॉग स्त्री आन्दोलन, स्त्री विमर्श, महिला सशक्तिकरण और नारी स्वातंत्र्य के हथियार के रूप में भी उभरकर सामने आया है। यहाँ महिला की उपलब्धि भी है, कमजोरी भी और बदलते दौर में उसकी बदलती भूमिका भी।
 
हर महिला-ब्लागर का अपना अनूठा अंदाज है, अपनी विशिष्ट प्रस्तुति है। यहाँ भिन्न-भिन्न रूपों में पाएंगें- कुछ अनुभव, कुछ अहसास, कुछ शब्द, कुछ चित्र। वर्तमान में ‘चोखेर बाली‘ एवं ‘नारी‘ जैसे सामुदायिक ब्लागों पर नारियों से जुड़े मुद्दों पर जमकर बहस हो रही है। यहाँ समाज में व्याप्त स्त्री के प्रति भेदभाव से लेकर लैंगिक हिंसा और पुरुषवादी दर्प को चुनौती तक शामिल है। स्त्री प्रश्नों पर केन्द्रित हिन्दी का पहला सामुदायिक ब्लॉग ‘चोखेर बाली‘ को माना जाता है, जिसे 4 फरवरी 2008 को सुजाता तेवतिया और रचना ने आरंभ किया। इसके शीर्षक पर लिखे शब्दों पर गौर करें, जो कि इस ब्लॉग के आरंभ होने की कहानी खुद ही बयां करता है- ”धूल तब तक स्तुत्य है जब तक पैरों तले दबी है, उड़ने लगे, आंधी बन जाए..तो आंख की किरकिरी है, चोखेर बाली है।” नारीवादी विमर्श को प्रखरता से उठाने के चलते चंद समय में ही इस ब्लाग से तमाम ब्लागर व लेखक जुड़ते गए। इस ब्लाग की एक खासियत यह भी है कि इस पर महिला व पुरुष समान रूप से लिख सकते हैं। वर्तमान में इससे 43 से ज्यादा ब्लागर्स जुड़े हुए हैं एवं इस पर लगभग 515 पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं, जो कि इसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। ‘चोखेर बाली‘ कई बार पीडि़त महिलाओं की व्यथा को जस का तस देने के लिए भी चर्चा में रहा। 5 अप्रैल 2008 को रचना ने एक अन्य सामुदायिक ब्लाग ‘नारी‘ का आरम्भ किया।
 
जहाँ ‘चोखेर बाली‘ नारी-पुरुष दोनों को लिखने का मौका देती है, वहीं ‘नारी‘ ब्लाग पर सिर्फ महिलाएं ही लिख सकती हैं। स्पष्ट है कि यह पहला ऐसा सामुदायिक हिन्दी ब्लाग है जिस पर सिर्फ नारियाँ ही लिख सकती हैं। नारी ब्लॉग के ऊपर लिखा वाक्य इसकी भूमिका को स्पष्ट करता है- ”जिसने घुटन से अपनी आजादी खुद अर्जित की एक कोशिश नारी को ’जगाने की’, एक आवाहन कि नारी और नर को समान अधिकार है और लिंगभेद/जेंडर के आधार पर किया हुआ अधिकारों का बंटवारा गलत है और अब गैर कानूनी और असंवैधानिक भी। बंटवारा केवल क्षमता आधारित सही होता है।” इस ब्लाग के सम्बंध में एक अन्य बात गौरतलब है कि यहाँ सिर्फ गद्य पोस्ट ही प्रकाशित हो सकती हैं, पद्य रचनाओं के लिए ”नारी का कविता ब्लॉग” है। ‘नारी‘ ब्लाग में जहाँ नारी सशक्तीकरण के तमाम आयामों को प्रस्तुत किया गया, वहीं कई गंभीर बहसों को भी जन्म दिया। इस पर लगभग 1040 से ज्यादा पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं, जो कि इसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। रचना को ब्लागिंग जगत में अपनी धारदार टिप्पणियों के लिए भी जाना जाता है। हालाँकि 15 अगस्त, 2011 से नारी ब्लॉग का सामुदायिक रूप खत्म कर इसे व्यक्तिगत ब्लॉग बना दिया गया था, पर 15 अगस्त, 2012 से इसने पुन: सामुदायिक रूप धारण कर लिया है। वर्तमान में इससे 22 से ज्यादा महिला ब्लागर्स जुडी हुई हैं.

आज की महिला यदि संस्कारों और परिवार की बात करती है तो अपने हक के लिए लड़ना भी जानती है। ऐसे में नारियों के ब्लॉग पर स्त्री की कोमल भावनाएं हैं तो दहेज, भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, आनर किलिंग, सार्वजनिक जगहों पर यौन उत्पीड़न, लिव-इन-रिलेशनशिप, महिला आरक्षण, सेना में महिलाओं के लिए कमीशन, न्यायपालिका में महिला न्यायधीशों की अनदेखी, फिल्मों-विज्ञापनों इत्यादि में स़्त्री को एक ‘आबजेक्ट‘ के रूप में पेश करना, साहित्य में नारी विमर्श के नाम पर देह-विमर्श का बढ़ता षडयंत्र, नारी द्वारा रुढि़यों की जकड़बदी को तोड़ आगे बढ़ना....जैसे तमाम विषयों के बहाने स्त्री के ‘स्व‘ और ‘अस्मिता‘ को तलाशता व्यापक स्पेस भी है। साहित्य की विभिन्न विधाओं से लेकर प्रायः हर विषय पर सशक्त लेखन और संवाद स्थापित करती महिला हिंदी ब्लागर, ब्लागिंग जगत में काफी प्रभावी हैं। चर्चित जाल-पत्रिका ’अभिव्यक्ति’ और ’अनुभूति’ का संपादन करने वाली पूर्णिमा वर्मन का नाम वेब पर हिंदी की स्थापना करने वालों में सर्वोपरि है। वर्ष 2004 में ’अभिव्यक्ति‘ पत्रिका में चर्चित हिंदी ब्लागर रवि रतलामी द्वारा लिखित हिन्दी में ब्लागिंग पर प्रथम आलेख ”अभिव्यक्ति का नया माध्यम: ब्लाग” प्रकाशित कर उन्होंने तमाम लोगों को ब्लागिंग से जुड़ने में मदद की। सम्प्रति संयुक्त अरब अमीरात में रह रहीं एवं विकिपीडिया के प्रमुख प्रबंधकों में से एक पूर्णिमा वर्मन ने प्रवासी और विदेशी हिंदी लेखकों और लेखिकाओं को प्रकाशित करने तथा हिंदी के साथ उनका सेतु-सम्बन्ध जोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई है। इसी प्रकार रश्मिप्रभा ने आनलाइन कवि सम्मेलन को लोकप्रिय बनाया तो संगीता पुरी ’गत्यात्मक ज्योतिष’, ’फलित ज्योतिष: सच या झूठ’ के बारे में बता रही हैं।
 
आकांक्षा यादव ‘उत्सव के रंग‘ बिखेर रही हैं तो ‘खाना खजाना‘ (गरिमा तिवारी), ‘खान-पकवान’, ‘खाना मसाला‘ (उर्मि चक्रवर्ती) को समेटते ब्लाग अपने जायकों से किसी के भी मुँह में पानी ला सकते हैं। रंजना भाटिया ‘अमृता प्रीतम की याद में‘ लिख रही हैं तो डा० हरदीप संधु ‘हिंदी हाइकु‘ को ब्लाग-जगत में समृद्ध कर रही हैं। विदेश में बैठकर रानी पात्रिका ‘आओ सीखें हिन्दी‘ का आहवान कर रही हैं, वहीं डा० कविता वाचक्नवी ‘हिंदी भारत‘ एवं ‘वेब प्रौद्योगिकी (हिंदी)‘ को बढ़ावा दे रही हैं। पूर्वोत्तर व कश्मीर में आतंकवाद के विरूद्ध लड़ने वालों हेतु प्रतीकात्मक रूप में ‘हमारी बहन शर्मीला‘ (मणिपुर की इरोम चानू शर्मीला जो पिछले 9 सालों से धरनारत हैं) ब्लाग भी दिखेगा। किन्नर भी ब्लागिंग के क्षेत्र में हैं और बाकायदा हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा (अर्धसत्य) इस क्षेत्र में प्रथम नाम है। ’शेयर बाजार और ऊर्जा चिकित्सा’ में भला कया संबध हो सकता है, गरिमा तिवारी मनोयोग से बताती हैं। अलका मिश्रा ’मेरा समस्त’ के माध्यम से बता रही हैं कि जडी बूटियाँ हमारा खजाना हैं, न विश्वास हो तो आजमा कर देखें। लबली गोस्वामी वेब निर्माण संबंधित प्रोग्रामिंग भाषाओं एवं वेब से जुडे़ तकनीकी पहलुओं को ‘संचिका‘ में समेट रही हैं।
 
नारीवादी सिद्धान्तों की साधारण शब्दों में व्याख्या और नारी की कुछ समस्याओं के कारणों की खोज और समाधान ढ़ूँढ़ने का प्रयास ’नारीवादी-बहस’ में है। इसकी संचालिका आराधना चतुर्वेदी ‘मुक्ति‘ कितनी साफगोई से लिखती हैं -”कुछ खास नहीं, बस नारी होने के नाते जो झेला और महसूस किया, उसे शब्दों में ढालने का प्रयास कर रही हूँ। चाह है, दुनिया औरतों के लिए बेहतर और सुरक्षित बने।” ऐसे ही तमाम विषय हैं, जिन पर महिला ब्लागर्स प्रखरता से लिख रही हैं।

यहाँ एक बात और गौर करने लायक है कि हिंदी में ब्लागिंग करने वाली महिलाएं सिर्फ हिंदी-बेल्ट तक ही नहीं सीमित हैं, बल्कि इनमें जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत एवं दक्षिण भारत तक की महिलाएं शामिल हैं। भारत से चर्चित महिला ब्लागरों में निर्मला कपिला (वीर बहूटी), Mired Mireg (घूघूती बासूती), रचना (नारी, बिना लाग लपेट के जो कहा जाए वही सच है), आकांक्षा यादव (शब्द शिखर, सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग, बाल दुनिया), हरकीरत हीर (हरकीरत ‘हीर‘), आर0 अनुराधा (इंद्रधनुष, समवेत), रचना सिंह (बस ऐसे ही, बस यूं ही, शब्द, नारी का कविता ब्लॉग, ब्लॉगर रचना का ब्लॉग बिना लाग लपेट के जो कहा जाए वही सच है, नारी NAARI), कविता रावत (kavita Rawat), रश्मि प्रभा (मेरी भावनाएं, क्षणिकाएं, नज्मों की सौगात, वट वृक्ष), रश्मि रविजा (मन का पाखी), रश्मि स्वरूप (नन्हीं लेखिका), शेफाली पांडे (कुमाऊंनी चेली), रेखा श्रीवास्तव (यथार्थ, मेरा सरोकार, कथा-सागर, मेरी सोच), रेखा (राहें जो अनजानी सी थी, मैंने पढ़ी है), रेखा रोहतगी (Rekha Rohatgi), शोभना चैरे (मेरी कविताओं का संग्रह, अभिव्यक्ति), लता ‘हया‘ (हया), फिरदौस खान (मेरी डायरी, The Pardise), संगीता पुरी (गत्यात्मक ज्योतिष, फलित ज्योतिष: सच या झूठ), संगीता स्वरूप (बिखरे मोती, गीत...मेरी अनुभूतियाँ), सुमन मीत (अर्पित सुमन, बावरा मन), मनीषा कुलश्रेष्ठ (बोलो जी), वीणा श्रीवास्तव (वीणा के सुर), वाणी गीत (गीत मेरे, ज्ञानवाणी), अजित गुप्ता (अजित गुप्ता का कोना), संध्या गुप्ता (संध्या गुप्ता), प्रतिभा कटियार (प्रतिभा की दुनिया), नमिता राकेश (नमिता राकेश), डा0 स्वाति तिवारी (शब्दों के अक्षत), प्रत्यक्षा सिन्हा (प्रत्यक्षा), अलका मिश्र (साहित्य हिन्दुस्तानी, मेरा समस्त), वंदना अवस्थी दुबे (अपनी बात, जो लिखा नहीं गया, किस्सा-कहानी), रजनी नैयर मल्होत्रा (मेरे मन की उलझन), मीनू खरे (उल्लास), पुनीता (हमारा बचपन, नारी जगत), रंजना सिंह (संवेदना संसार), रंजना (रंजू) भाटिया (साया, अमृता प्रीतम की याद में, कुछ मेरी कलम से), आराधना चतुर्वेदी ‘मुक्ति‘ (aradhana-आराधना का ब्लॉग, नारीवादी-बहस, Feminist Poems), डा0 मीना अग्रवाल (टमाटर-2), किरण राज पुरोहित नितिला (भोर की पहली किरण, मेरी कृति), गरिमा तिवारी (खाना खजाना, शेयर बाजार और ऊर्जा चिकित्सा, मैं और कुछ नहीं), पारुल पुखराज (सरगम, चांद पुखराज का), सीमा गुप्ता (My Passion, kuchlamhe), सीमा रानी (काहे नैना लागे, कुछ कवितायें कुछ हैं गीत), सीमा सचदेव (खट्टी-मीठी यादें, सञ्जीवनी, मानस की पीड़ा, मेरी आवाज, नन्हा मन), डा0 मोनिका शर्मा (परवाज....शब्दों के पंख), स्वाति ऋषि चड्ढा (मेरे एहसास भाव), ज्योत्सना पांडेय (ज्योत्सना मैं), पूनम श्रीवास्तव (झरोखा), अपर्णा मनोज भटनागर (मौलश्री), अनामिका ‘सुनीता‘( अनामिका की सदायें, अभिव्यक्तियाँ), सुशीला पुरी (सुशीला पुरी), नीलम पुरी (Ahsas), मृदुला प्रधान (Mridula's blog), विनीता यशस्वी (यशस्वी), वंदना गुप्ता (जिन्दगी एक खामोश सफर, जख्म जो फूलों ने दिये, एक प्रयास), शारदा अरोरा (गीत-गजल, जिन्दगी के रंग दोस्तों के संग, जीवन यात्रा, एक दृष्टिकोण, सफर के सजदे में), रचना त्रिपाठी (टूटी-फूटी), प्रिया (एक नीड़ ख्वाबों,ख्यालों और ख्वाहिशों का, जीवन के रंग मेरी तूलिका के संग), डा0 निधि टंडन (जिंदगीनामा), फौजिया रियाज (अल्फाज), सीमा सिंघल (सदा), डॉ. जेन्नी शबनम (लम्हों का सफर), मुदिता (एहसास अंतर्मन के), सुषमा ’आहुति’ (आहुति), साधना वैद (Sudhinamaa), प्रवीणा जोशी (रेत पर बनते निशान), शेफाली श्रीवास्तव (मेरे शब्द), दर्शन कौर धनोय (मेरे अरमान.. मेरे सपने), इस्मत जैदी (शेफा कजगाँवी), ऋचा (Lamhon ke jharokhe se), स्तुति पांडेय (शान की सवारी), कंचन सिंह चौहान (ह्नदय गवाक्ष), पल्लवी त्रिवेदी (कुछ एहसास), हर्ष छाया (जींस गुरू), विभा रानी (छम्मकछल्लो कहिस), लवली कुमारी (संचिका), शमा (सिमटे लम्हें), मीनाक्षी पन्त (एक नजर इधर भी, सुविचार), अपर्णा त्रिपाठी (Palash पलाश), सुमन जिंदल (Kshitij), शहरोज अनवरी (साझी संस्कृति), सुषमा सिंह (चिट्ठी जगत), प्रियदर्शिनी तिवारी (प्रियदर्शिनी), सोनल रस्तोगी (कुछ कहानियाँ, कुछ नज्में), महेश्वरी कनेरी (अभिव्यंजना), असीमा भट्ट (असीमा), डा. किरण मिश्रा (किरण की दुनिया), आशा (Akanksha), पवित्रा अग्रवाल (लघु कथा, बाल किशोर), प्रीति महेता (Antrang - The InnerSoul), सुधाकल्प (तूलिका सदन, बचपन के गलियारे, बाल कुंज), (ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड), रुचि झा (Aagaaz), शबनम खान (क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलती), स्वप्न मंजूषा अदा (काव्य मंजूषा), नीलम (पाखी- मेरी उम्मीद, क्या अमरों का लोक मिलेगा तेरी करुणा का उपहार), रमा दिवेदी (अनुभूति कलश), मीनू खरे (उल्लास, Science is interesting), गायत्री शर्मा (मीठी मालवी), बेजी जैसन ( दृष्टिकोण, अवलोकन, मेरी कठपुतलियाँ), दीप्ति गुप्ता (दीप्ति गुप्ता), मीनाक्षी अरोड़ा (सुजलाम- इधर- उधर से), पूजा उपाध्याय (लहरें), प्रियंका राठौड़ (विचार प्रवाह), संध्या शर्मा (मैं और मेरी कविताएँ), विश्व महिला परिवार इत्यादि एक लम्बी सूची है, जो अनवरत अपनी रचनात्मक पहल से हिन्दी ब्लागिंग को समृद्ध कर रही हैं। हिंदी में ब्लागिंग करने वाली महिलाओं के बारे में Woman Who Blog In Hindi ब्लॉग, http://hindibloggerwoman.blogspot.com/ और ’महिलावाणी’ एग्रीगेटर पर भी विस्तार से देखा जा सकता है।

हिन्दी ब्लागिंग में महिलाओं की सक्रियता सिर्फ भारत तक ही नहीं बल्कि विदेशों तक विस्तारित है। इनमें शारजाह, संयुक्त अरब अमीरात से पूर्णिमा वर्मन (चर्चित जाल-पत्रिका अभिव्यक्ति और अनुभूति की सम्पादिका, चोंच में आकाश, अभिव्यक्ति मंच, एक आंगन धूप, साहित्य समाचार, शुक्रवार चैपाल), आबूधाबी, संयुक्त अरब अमीरात से अल्पना वर्मा (व्योम के पार, भारत दर्शन), दुबई, संयुक्त अरब अमीरात से मीनाक्षी धन्वन्तरी (प्रेम ही सत्य है), कनाडा से स्वप्न मंजूषा शैल ‘अदा‘ (काव्य मंजूषा, संतोष शैल, ब्लाग रेडियो), पर्थ, आस्ट्रेलिया से उर्मि चक्रवर्ती (गुलदस्ते-ए-शायरी, कवितायें), डा० हरदीप संधू (शब्दों का उजाला, हिंदी हाइकु), डॉ० भावना कुँअर (दिल के दरमियाँ, शाख के पत्ते - लीलावती बंसल), सिंगापुर से श्रद्धा जैन (भीगी गजल), लंदन से शिखा वाष्र्णेय (स्पंदन), यू0के0 से डा0 कविता वाचक्नवी (हिन्दी भारत, वागर्थ, पीढि़याँ, वेब-प्रोद्यौगिकी (हिन्दी),Beyond the second Sex (स्त्री विमर्श), पल्लवी (मेरे अनुभव), अमेरिका से लावण्या शाह (लावण्यम - अंतर्मन), आशा जोगलेकर (स्वप्न रंजिता, श्रीमद्भागवत व्यंजनम्), डा0 सुषमा नैथानी (स्वप्नदर्शी), गिरिबाला जोशी (द ग्रिस्ट मिल: आटा चक्की), रानी विशाल (काव्य तरंग), वंदना सिंह (कागज मेरा मीत है कलम मेरी सहेली), पोर्टलैंड से रानी पात्रिक (आओ सीखें हिन्दी), थाईलैंड से डा0 दिव्या श्रीवास्तव (Zeal), स्वीडन से अनुपमा पाठक (अनुपम यात्रा...की शुरूआत), क्वालालंपुर, मलेशिया से अनुपमा त्रिपाठी (anupama's sukrity) इत्यादि नाम लिये जा सकते हैं।

कहते हैं बच्चों की प्रथम शिक्षक माँ होती है। माँ की लोरियाँ, लाड-दुलार व खेल-खेल में बताई गई बातें ही बच्चों का परिवेश तैयार करते हैं और उन्हें अपने संस्कारों से परिचित कराते हैं। ऐसे में तमाम महिलाएं नन्हे-मुन्ने बच्चों के लिए भी तमाम ब्लाग संचालित कर रही हैं। इनमें बाल-मन से जुडे तमाम सवाल हैं, बालोपयोगी साहित्य है, प्रेरक प्रसंग हैं, बच्चों से जुड़ी तमाम रचनाएं व बातें हैं। इन ब्लागों में प्रमुख हैं- बाल दुनिया (आकांक्षा यादव), बाल संसार (किरण गुप्ता), बाल सभा (डा० कविता वाचक्नवी), बाल कुंज, बचपन के गलियारे (सुधा कल्प), बाल वृंद (अपराजिता), नन्हा मन (सीमा सचदेव), बच्चों की दुनिया (शन्नू), लाडली (बेटियों का ब्लाग: सदा), खिलौने वाला घर (रश्मि प्रभा), मेरा आपका प्यारा ब्लॉग, नन्हे फरिश्तों के लिए हम तो हर पल जिए (शिखा कौशिक), पाखी-मेरी उम्मीद (नीलम),Baby Notes (मोनिका शर्मा), पार्थवी (इंदु अरोड़ा), बाल किशोर (पवित्रा अग्रवाल), मन के रंग (कार्तिका सिंह)। ऐसे ही तमाम ब्लाग अपनी पोस्ट से बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी रिझा रहे हैं ।

जब घर में मम्मी व अन्य ब्लागिंग कर रहे हों तो भला बेटियाँ इससे पीछे कैसे रह सकती हैं? आखिर ये 21वीं सदी की बेटियाँ हैं जो वक्त के माथे पर नई इबारत लिखने को तत्पर हैं । बेटियों के इन ब्लॉगों पर उनके हँसने-रोने, रूठने-मनाने, खेलने-कूदने, सीखने-सिखाने की बातें हैं तो उनकी बनाई ड्राइंग, उनकी दिनचर्या, उनका घूमना-फिरना, उनकी शरारतें, स्कूल की बातें, बर्थ-डे पार्टियाँ, उनकी प्यारी-प्यारी बातें सब कुछ यहाँ मिलेंगीं और इन बेटियों के लिए यह काम उनके मम्मी-पापा करते हैं। बेटियों से जुड़े प्रमुख ब्लाग हैं- पाखी की दुनिया (अक्षिता : पाखी), नन्हीं परी (इशिता जैन), चुलबुली (चुलबुल), लविजा | Laviza (लविज़ा), अक्षयांशी (अक्षयांशी सिंह सेंगर), अनुष्का (अनुष्का जोशी),kritika choudhary (कृतिका चैधरी), पंखुरी टाइम्स (पंखुरी), Angel(अनन्या साहू), परी कथा (मानसी), चुन चुन गाती चिडि़या (पाखी), नन्हीं कोपल (कोपल कोकास), कुहू का कोना (कुहू), Little Fingers(चिन्मयी) इत्यादि। बच्चों की मासूमियत और नटखटपन के गवाह बनते ये ब्लॉग काफी लोकप्रिय हैं। इनमें अक्षिता (पाखी) को तो हिंदी साहित्य निकेतन, परिकल्पना डॉट कॉम और नुक्कड़ डॉट कॉम की त्रिवेणी द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में 30 अप्रैल, 2011 को आयोजित भव्य अन्तराष्ट्रीय ब्लागर्स सम्मलेन में श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर हेतु ”हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010” दिया गया। यह सम्मान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ”निशंक” द्वारा चर्चित साहित्यकार अशोक चक्रधर, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामदरश मिश्र, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे गणमान्य साहित्यकारों की गौरवमयी उपस्थिति में दिया गया।
 
अक्षिता (पाखी) का चित्र चर्चित बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘चूं-चूं‘ के कवर-पेज पर भी दिया। इतनी कम उम्र में अक्षिता के एक कलाकार एवं एक ब्लागर के रूप में असाधारण प्रदर्शन हेतु भारत सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्णा तीरथ ने ’राष्ट्रीय बाल पुरस्कार, 2011’ भी प्रदान किया। इसके तहत अक्षिता को 10,000 रूपये नकद राशि, एक मेडल और प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया। मात्र 4 साल 8 माह की आयु में ’राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’ प्राप्त कर नन्हीं ब्लागर अक्षिता ने एक अनूठा कीर्तिमान बनाया है। यही नहीं यह प्रथम अवसर था, जब किसी प्रतिभा को सरकारी स्तर पर हिंदी ब्लागिंग के लिए पुरस्कृत-सम्मानित किया गया। चुलबुल तो अपनी हर बात प्यारा सी चित्र बनाकर करती है। ऐसे ही बेटियों का हर ब्लाग अनूठा है। तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने इनकी इस क्रिएटिवटी को लेकर फीचर/लेख भी प्रकाशित किए हैं। वाकई बेटियों और उनसे जुड़े ब्लॉगों को देखकर अज्ञेय जी के शब्द याद आते हैं-‘‘भले ही बच्चा दुनिया का सर्वाधिक संवेदनशील यंत्र नहीं है पर वह चेतनशील प्राणी है और अपने परिवेश का समर्थ सर्जक भी। वह स्वयं स्वतन्त्र चेता है, क्रियाशील है एवं अपनी अंतःप्रेरणा से कार्य करने वाला है, जो कि अधिक स्थायी होता है।‘‘

वास्तव में देखा जाय तो ब्लॉगिंग के क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति बड़ी मजबूत है और वे तमाम विषयों पर अपनी रुचि के हिसाब से खूब लिख रही हैं। अपने व्यक्तिगत ब्लॉगों के साथ तमाम सामुदायिक ब्लागों पर भी महिलाएं अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। अन्य ब्लॉगों पर प्रकाशित रचनाओं को महिलाएं खूब प्रोत्साहित कर रही हैं। अपनी लेखनी के जरिए जहाँ तमाम छुए-अनछुए मुद्दों को स्थान दे रही हैं, वहीं 21वीं सदी में तेजी से बढ़ते नारी के कदमों को भी रेखांकित कर रही हैं। कई बार तो कुछ पुरुष ब्लागर्स यह सब बर्दाश्त नहीं कर पाते और अनाप-शनाप टिप्पणियां भी करते दिखते हैं। पर उन्हें उसी अंदाज में भरपूर जवाब भी मिल रहा है, आखिर यही तो सशक्तीकरण है। यही नहीं महिलाओं के लिए उलूल-जुलल लिखने एवं उन्हें परंपरागत रूढि़वादी बधनों में बाँधने के हिमायती पोस्टों पर अपना वैचारिक प्रतिरोध भी दर्ज कर रही हैं। प्रिंट मीडिया भी विभिन्न ब्लागों की चर्चा में नारियों द्वारा लिखी जा रही पोस्टों को अपने पन्नों पर बखूबी स्थान दे रहा है, ताकि वहाँ भी विमर्श का दायरा खुल सके।
 
दूसरे शब्दों में कहें तो हिन्दी ब्लागिंग द्वारा नारी सशक्तीकरण को नए आयाम मिले हैं। तमाम महिला-ब्लाॅगर्स सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स- फेसबुक, टिवटर, आरकुट, हाई 5, बिग अड्डा, गूगल प्लस इत्यादि पर भी उतनी ही सक्रिय हैं। कुछेक महिला ब्लागर्स तो इससे परे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भी सक्रिय हैं। वस्तुतः ब्लाग का सबसे बड़ा फायदा है कि यहाँ कोई सेंसर नहीं है, ऐसे में जो चीज अपील करे उस पर स्वतंत्रता से विचार प्रकट किया जा सकता है। इस क्षेत्र में महिलाओं का भविष्य उज्जवल है, क्योंकि यहाँ कोई रूढि़गत बाधाएं नहीं हैं। जैसे-जैसे हिंदी ब्लागिंग का दायरा बढ़ता गया, वैसे-वैसे इस पर सम्मलेन, सेमिनार, शोध और पुस्तकों का उपक्रम भी आरंभ हो गया। इन सबमें महिला ब्लागर्स ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। मध्य प्रदेश स्थित विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से गायत्री शर्मा ”हिंदी ब्लागिंग के विविध आयाम” विषय पर शोधरत हैं तो पेशे से पत्रकार और ब्लागिंग में सक्रिय सुषमा सिंह भी हिंदी-ब्लाॅगिंग पर शोधरत हैं। स्पष्ट है कि महिलाएं हिन्दी ब्लागिंग को न सिर्फ अपना रही हैं बल्कि न्यू मीडिया के इस अन्तर्राष्ट्रीय विकल्प के माध्यम से अपनी वैश्विक पहचान भी बनाने में सफल रही हैं।

 
 
चित्र साभार : www.shabdsharrang.blogspot.com

रविवार, 30 सितंबर 2012

आकांक्षा यादव को 'हिंदी भाषा-भूषण' की मानद उपाधि

युवा कवयित्री, ब्लागर एवं साहित्यकार सुश्री आकांक्षा यादव को हिन्दी साहित्य में प्रखर रचनात्मकता एवं अनुपम कृतित्व के लिए देश-विदेश में प्रतिष्ठित साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक प्रतिष्ठान 'साहित्य-मंडल', श्रीनाथद्वारा ( राजस्थान) द्वारा एक विशिष्ट हिंदी-सेवी के रूप में हिंदी दिवस (14 सितम्बर, 2012 ) पर आयोजित दो दिवसीय सम्मलेन में "हिंदी भाषा-भूषण" की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया| उनकी अनुपस्थिति में यह सम्मान उनके पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव ने ग्रहण किया, जिन्हें कि इसी समारोह में ग्यारह हज़ार रूपये के ’’श्रीमती सरस्वती सिंहजी सम्मान-2012’’ से सम्मानित किया गया।
 
 
गौरतलब है कि सुश्री आकांक्षा यादव की आरंभिक रचनाएँ दैनिक जागरण और कादम्बिनी में प्रकाशित हुई और फिलहाल वे देश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं. नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली सुश्री आकांक्षा यादव के लेख, कवितायेँ और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनोंध्पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीँ आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं. पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ अंतर्जाल पर भी सक्रिय सुश्री आकांक्षा यादव की रचनाएँ इंटरनेट पर तमाम वेब/ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं. आपकी तमाम रचनाओं के लिंक विकिपीडिया पर भी दिए गए हैं. शब्द-शिखर, सप्तरंगी-प्रेम, बाल-दुनिया और उत्सव के रंग ब्लॉग आप द्वारा संचालित/ ध्सम्पादित हैं. बाल-गीत संग्रह 'चाँद पर पानी' की रचनाकार एवं ‘क्रांति-यज्ञ: 1857-1947 की गाथा‘ पुस्तक का संपादन करने वाली सुश्री आकांक्षा के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु जी ने ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है। 
 
सुश्री आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।एक रचनाकार के रूप में बात करें तो सुश्री आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।
 
प्रस्तुति - रत्नेश कुमार मौर्या, संयोजक : शब्द-साहित्य, इलाहाबाद.

बुधवार, 5 सितंबर 2012

गुरु-शिष्य की बदलती परंपरा

भारतीय संस्कृति का एक सूत्र वाक्य है-‘तमसो मा ज्योतिर्गमय।‘ अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने की इस प्रक्रिया में शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान है। भारतीय परम्परा में शिक्षा को शरीर, मन और आत्मा के विकास द्वारा मुक्ति का साधन माना गया है। शिक्षा मानव को उस सोपान पर ले जाती है जहाँ वह अपने समग्र व्यक्तित्व का विकास कर सकता है। भारत में गुरू-शिष्य की लम्बी परंपरा रही है।

गुरुब्रह्म गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूः साक्षात परब्रह्म, तस्मैं श्री गुरूवे नमः।।


प्राचीनकाल में राजकुमार भी गुरूकुल में ही जाकर शिक्षा ग्रहण करते थे और विद्यार्जन के साथ-साथ गुरू की सेवा भी करते थे। राम-विश्वामित्र, कृष्ण-संदीपनी, अर्जुन-द्रोणाचार्य से लेकर चंद्रगुप्त मौर्य-चाणक्य एवं विवेकानंद-रामकृष्ण परमहंस तक शिष्य-गुरू की एक आदर्श एवं दीर्घ परम्परा रही है। उस एकलव्य को भला कौन भूल सकता है, जिसने द्रोणाचार्य की मूर्ति स्थापित कर धनुर्विद्या सीखी और गुरूदक्षिणा के रूप में द्रोणाचार्य ने उससे उसके हाथ का अंगूठा ही माँग लिया था। श्री राम और लक्ष्मण ने महर्षि विश्वामित्र, तो श्री कृष्ण ने गुरू संदीपनी के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण की और उसी की बदौलत समाज को आतातायियों से मुक्त भी किया। गुरूवर द्रोणाचार्य ने पांडव-पुत्रों विशेषकर अर्जुन को जो शिक्षा दी, उसी की बदौलत महाभारत में पांडव विजयी हुए। गुरूवर द्रोणाचार्य स्वयं कौरवों की तरफ से लड़े पर कौरवों को विजय नहीं दिला सके क्योंकि उन्होंने जो शिक्षा पांडवों को दी थी, वह उन पर भारी साबित हुई। गुरू के आश्रम से आरम्भ हुई कृष्ण-सुदामा की मित्रता उन मूल्यों की ही देन थी, जिसने उन्हें अमीरी-गरीबी की खाई मिटाकर एक ऐसे धरातल पर खड़ा किया जिसकी नजीर आज भी दी जाती है। विश्व-विजेता सिकंदर के गुरू अरस्तू को भला कौन भुला सकता है। अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने तो अपने पुत्र की शिक्षिका को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि उसकी शिक्षा में उनका पद आड़े नहीं आना चाहिए। उन्होंने शिक्षिका से अपने पुत्र को सभी शिक्षाएं देने का अनुरोध किया जो उसे एक अच्छा व्यक्ति बनाने में सहायता करती हों।

वस्तुतः शिक्षक उस प्रकाश-स्तम्भ की भांति है, जो न सिर्फ लोगों को शिक्षा देता है बल्कि समाज में चरित्र और मूल्यों की भी स्थापना करता है। शिक्षा का रूप चाहे जो भी हो पर उसके सम्यक अनुपालन के लिए शिक्षक का होना निहायत जरूरी है। शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं बल्कि चरित्र विकास, अनुशासन, संयम और तमाम सद्गुणों के साथ अपने को अप-टू-डेट रखने का माध्यम भी है। कहते हैं बच्चे की प्रथम शिक्षक माँ होती है, पर औपचारिक शिक्षा उसे शिक्षक के माध्यम से ही मिलती है। प्रदत शिक्षा का स्तर ही व्यक्ति को समाज में तदनुरूप स्थान और सम्मान दिलाता है। शिक्षा सिर्फ अक्षर-ज्ञान या डिग्रियों का पर्याय नहीं हो सकती बल्कि एक अच्छा शिक्षक अपने विद्यार्थियों का दिलो-दिमाग भी चुस्त-दुरुस्त बनाकर उसे वृहद आयाम देता है। शिक्षक का उद्देश्य पूरे समाज को शिक्षित करना है। शिक्षा एकांगी नहीं होती बल्कि व्यापक आयामों को समेटे होती है।

आजादी के बाद इस गुरू-शिष्य की दीर्घ परम्परा में तमाम परिवर्तन आये। 1962 में जब डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति के रूप में पदासीन हुए तो उनके चाहने वालों ने उनके जन्मदिन को “शिक्षक दिवस” के रूप में मनाने की इच्छा जाहिर की। डा0 राधाकृष्णन ने कहा कि- ”मेरे जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने के निश्चय से मैं अपने को काफी गौरवान्वित महसूस करूँगा।” तब से लेकर हर 5 सितम्बर को “शिक्षक दिवस” के रूप में मनाया जाता है। डा0 राधाकृष्णन ने शिक्षा को एक मिशन माना था और उनके मत में शिक्षक होने का हकदार वही है, जो लोगों से अधिक बुद्धिमान व विनम्र हों। अच्छे अध्यापन के साथ-साथ शिक्षक का अपने छात्रों से व्यवहार व स्नेह उसे योग्य शिक्षक बनाता हैै। मात्र शिक्षक होने से कोई योग्य नहीं हो जाता बल्कि यह गुण उसे अर्जित करना होता है। डा. राधाकृष्णन शिक्षा को जानकारी मात्र नहीं मानते बल्कि इसका उद्देश्य एक जिम्मेदार नागरिक बनाना है। शिक्षा के व्यवसायीकरण के विरोधी डा0 राधाकृष्णन विद्यालयों को ज्ञान के शोध केंद्र, संस्कृति के तीर्थ एवं स्वतंत्रता के संवाहक मानते थे। यह डा0 राधाकृष्णन का बड़प्पन ही था कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे वेतन के मात्र चौथाई हिस्से से जीवनयापन कर समाज को राह दिखाते रहे।

वर्तमान परिपे्रक्ष्य में देखें तो गुरू-शिष्य की परंपरा कहीं न कहीं कलंकित हो रही है। आए दिन शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों के साथ एवं विद्यार्थियों द्वारा शिक्षकों के साथ दुव्र्यवहार की खबरें सुनने को मिलती हैं। जातिगत भेदभाव प्राइमरी स्तर के स्कूलों में आम बात है। यही नहीं तमाम शिक्षक अपनी नैतिक मर्यादायें तोड़कर छात्राओं के साथ अश्लील कार्यों में लिप्त पाये गये। आज न तो गुरू-शिष्य की परंपरा रही और न ही वे गुरू और शिष्य रहे। व्यवसायीकरण ने शिक्षा को धंधा बना दिया है। संस्कारों की बजाय धन महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसे में जरूरत है कि गुरू और शिष्य दोनों ही इस पवित्र संबंध की मर्यादा की रक्षा के लिए आगे आयें ताकि इस सुदीर्घ परंपरा को सांस्कारिक रूप में आगे बढ़ाया जा सके।

आज शिक्षा को हर घर तक पहुँचाने के लिए तमाम सरकारी प्रयास किए जा रहे है, पर इसी के साथ शिक्षकों की मनःस्थिति के बारे में भी सोचने की जरूरत है। शिक्षकों को भी वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसके वे हकदार हैं। शिक्षक, शिक्षा (ज्ञान) और विद्यार्थी के बीच एक सेतु का कार्य करता है और यदि यह सेतु ही कमजोर रहा तो समाज को खोखला होने में देरी नही लगेगी। देश का शायद ही ऐसा कोई प्रांत हो, जहाँ विद्यार्थियों के अनुपात में अध्यापकों की नियुक्ति हो, फिर शिक्षा व्यवस्था कैसे सुधरे ? अभी भी देश में छात्र शिक्षक अनुपात 32: 1 है, जबकी 324 ऐसे जिले हैं जिनमें छात्र शिक्षक अनुपात 3:1 से कम है। देश में नौ फीसदी स्कूल ऐसे हैं जिनमें केवल एक शिक्षक हैं तो 21 फीसदी ऐसे शिक्षक हैं जिनके पास पेशेवर डिग्री तक नहीं है। मतगणना-जनगणना से लेकर अन्य तमाम कार्यों में शिक्षकों की ड्यूटी भी उन्हें मूल शिक्षण कार्य से विरत रखती है। ऐसे में जब शिक्षा की नींव ही कमजोर होगी, तो विद्यार्थियों का उन्नयन कैसे होगा, यह एक गंभीर समस्या है।

‘शिक्षक दिवस‘ एक अवसर प्रदान करता है जब हम समग्र रूप में शिक्षकों की भूमिका व कर्तव्यों पर पुनर्विचार कर सकें और बदलते प्रतिमानों के साथ उनकी भूमिका को और भी सशक्त रूप दे सकें।

(डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 5 सितम्बर 2012 में प्रकाशित मेरा आलेख)

- आकांक्षा यादव

बुधवार, 29 अगस्त 2012

’दशक के श्रेष्ठ ब्लागर दम्पत्ति' के रूप में कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव सम्मानित

जीवन में कुछ करने की चाह हो तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं। हिन्दी-ब्लागिंग के क्षेत्र में ऐसा ही रास्ता अखि़्तयार किया कृष्ण कुमार यादव व आकांक्षा यादव ने। 2008 में अपना ब्लागिंग-सफर आरंभ करने वाले इस दम्पत्ति को परिकल्पना समूह द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ’’दशक के श्रेष्ठ दम्पत्ति ब्लागर’’ के रूप में सम्मानित किया गया है। इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं पद पर पदासीन कृष्ण कुमार यादव हिन्दी-साहित्य में एक सुपरिचित नाम हैं, जिनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनके जीवन पर एक पुस्तक ’बढ़ते चरण शिखर की ओर’ भी प्रकाशित हो चुकी है। आकांक्षा यादव भी नारी-सशक्तीकरण को लेकर प्रखरता से लिखती हैं । साहित्य के साथ-साथ ब्लागिंग में भी हमजोली यादव दम्पत्ति को 27 अगस्त, 2012 को लखनऊ में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लागर सम्मेलन में 'दशक के श्रेष्ठ ब्लागर दम्पत्ति’ का अवार्ड दिया गया। मुख्य अतिथि श्री श्री प्रकाश जायसवाल केन्द्रीय कोयला मंत्री की अनुपस्थिति में यह सम्मान वरिष्ठ साहित्यकार उदभ्रांत, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक शैलेन्द्र सागर आदि ने संयुक्त रूप से दिया।

गौरतलब है कि हिंदी ब्लागिंग का आरंभ वर्ष 2003 में हुआ और इस पूरे एक दशक में तमाम ब्लागरों ने अपनी
अभिव्यक्तियों को विस्तार दिया। पर कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव ने वर्ष 2008 में ब्लाग जगत में कदम रखा और 5 साल के भीतर ही सपरिवार विभिन्न विषयों पर आधारित दसियों ब्लाग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लागिंग की तरफ प्रवृत्त किया और अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ ब्लागिंग को भी नये आयाम दिये। इन दम्पत्ति के ब्लागों को सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भरपूर सराहना मिली। कृष्ण कुमार यादव के ब्लाग ’डाकिया डाक लाया’ को 94 देशों, ’शब्द सृजन की ओर’ को 70 देशों, आकांक्षा यादव के ब्लाग ’शब्द शिखर’ को 66 देशों और इस ब्लागर दम्पत्ति की सुपुत्री एवं पिछले वर्ष ब्लागिंग हेतु भारत सरकार द्वारा ’’राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’’ से सम्मानित अक्षिता (पाखी) के ब्लाग ’पाखी की दुनिया’ को 94 देशों में देखा-पढ़ा जा चुका है।

उमानाथ बाली प्रेक्षागृह, कैसर बाग, लखनऊ में आयोजित इस अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में न्यू मीडिया की संभावना एवं चुनौतियों को लेकर तमाम सेमिनार हुये। ’न्यू मीडिया के सामाजिक सरोकार’ विषय आधारित सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप में कृष्ण कुमार यादव ने ब्लागिंग को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की बात कही और एक माध्यम के बजाय इसके विधागत विकास पर जोर दिया।

इस दम्पत्ति को सम्मानित किये जाने के अवसर पर देश-विदेश के तमाम ब्लागर, साहित्यकार, पत्रकार व प्रशासक उपस्थित थे। प्रमुख लोगों में मुद्रा राक्षस, वीरेन्द्र यादव, पूर्णिमा वर्मन, रवि रतलामी, रवीन्द्र प्रभात , जाकिर अली ’रजनीश’, शिखा वार्ष्णेय, सुभाष राय इत्यादि प्रमुख थे।
(साभार : राष्ट्रीय सहारा, 29 अगस्त, 2012)