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रविवार, 21 मई 2017

रेवाड़ी की धाकड़ बेटियों ने शिक्षा और सुरक्षा हेतु अनशन कर समाज को दी एक नई दिशा

इक्कीसवीं सदी में भी जब अपने देश की बेटियों को शिक्षा के लिए गुहार लगानी पड़ती है, और वह भी उस राज्य में जहाँ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" का नारा बुलंद किया था, तो यह घटना समाज को आइना दिखाती नज़र आती है।  

शिक्षा का हमारे जीवन में कितना महत्वपूर्ण स्थान है, इस बात को साबित कर दिखाया है हरियाणा के रेवाड़ी जिले के गोठड़ा गांव की बेटियों ने। धरना-प्रदर्शन का नाम सामने आते ही हमारे सामने राजनेताओं या सामाजिक कार्यकर्ताओं के चेहरे सामने घूमने लगते हैं, पर भारत के इतिहास में इस तरह की ये पहली घटना है, जब किसी स्कूल की 80 से ज्यादा छात्राएं धरने पर बैठ गई, और 13 छात्राएं आमरण अनशन पर रहीं । इनकी मांग थी  कि इनके गांव के स्कूल को 12 वीं तक कर दिया जाएं, जिससे इन्हें आगे की  पढ़ाई के लिए दूसरे गांव न जाने पड़े। इसके पीछे एक बहुत बड़ी वजह है सुरक्षा। 10वीं के बाद यदि छात्राएं दूसरे गांव 12वीं की पढ़ाई के लिए जाती हैं  तो उन्हें छेड़छाड़ जैसी हरकतों का सामना करना पड़ता है। इसीलिए इन छात्राओं की माँग थी  कि उनके गांव के स्कूल को ही 12वीं तक कर दिया जाए। 

दरअसल, गोठड़ा गांव की छात्राओं के दूसरे गांव तक जाकर बारहवीं की पढ़ाई के लिए जाने वाले रास्ते पर कई परेशानियां हैं। जिसमें सबसे पहला तो इस रास्ते में हर तरफ शराब का ठेका है, जिस वजह से घर के लोग तैयार ही नहीं होते है अपनी लड़कियों को भेजने के लिए। बाहर जाने वाली लड़कियों के साथ आए दिन छेड़छाड़ होती रहती है, और उन पर भद्दे कमेंट किए जाते हैं।

अपने हक और अपनी सुरक्षा के लिए 8 दिन से भूख हड़ताल पर बैठी छात्राएं जब अस्पताल पहुंच गई और मीडिया ने भी इसका संज्ञान लेना आरम्भ किया तो  उसके बाद सरकार मानी। हरियाणा सरकार ने इन छात्राओं के स्कूल को अपग्रेड करके 10वीं से 12वीं तक करने की घोषणा कर दी है। वहीं मनचलों पर लगाम लगाने के लिए  विशेष प्रयास करने हेतु भी  पुलिस को सख्त निर्देश दे दिए गए हैं। इसके बाद तो कहा गया कि, रंग लाया रेवाड़ी की बेटियों का संघर्ष, झुक गई हरियाणा सरकार। पर वास्तव देखा जाये तो भारत के ग्रामीण अंचल के तमाम स्कूलों में ऐसा ही माहौल देखने को मिलता है। जब लड़कियां घर वालों से शिकायत करती हैं तो या तो उन्हें चुप करा दिया जाता है या उनकी पढाई छुड़वाकर घर में बिठा दिया जाता है। तमाम सरकारी वायदों और क़ायदे-कानूनों के बावजूद बालिका-शिक्षा की स्थिति देश में दयनीय है। लड़कियाँ तो पढ़कर आगे बढ़ना चाहती हैं,पर आड़े आती हैं तमाम मुसीबतें। 

खैर, रेवाड़ी की लड़कियों के इस आंदोलन ने समाज को एक नई दिशा दी है। अनशन तो कई होते हैं, पर इस तरह का अनशन देश के लिए नया है। यह देश के जनप्रतिनिधियों के लिए भी एक सबक है कि अब बच्चे भी अपने हक़ के लिए जागरूक हो रहे हैं, उन्हें बहुत दिन तक लॉलीपॉप देकर बरगलाया नहीं जा सकता। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसी आधारभूत आवश्यकताओं को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाकर ही समाज को समृद्ध बनाया जा सकता है। 


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