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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

सिंधु और साक्षी के बाद समाज में बेटियाँ



बेटियों को मौका मिले तो वो तारे भी जमीं पर लाने का हौसला रखती हैं। स्कूली शिक्षा से लेकर कैरियर तक उन्हें जहाँ भी मौका मिला, डॉक्टर-इंजीनियर-आई.ए.एस की परीक्षाओं से लेकर अंतरिक्ष की कल्पना तक...... हर जगह उन्होंने नए मुकाम गढ़े। पर इस सबके बावजूद पितृसत्तात्मक समाज सदैव से बेटियों के साथ दोयम व्यवहार करता रहा है। भ्रूण-हत्या से लेकर धरा पर आने तक हर कदम पर उसकी आवाज़ और जज्बे को कुचलने का प्रयास किया गया। उनकी शारीरिक संरचना को ही उनकी कमजोरी बना दिया गया।  रक्षाबंधन जैसे त्यौहार को भाई द्वारा बहन की रक्षा से जोड़कर, बहनों को और कमजोर बना दिया गया। ऐसे में रियो ओलम्पिक में जब लाव-लश्कर के साथ गई भारतीय टीम को अंतिम समय पर दो बेटियों ने मेडल लाकर उबारा तो एक बार फिर से समाज में बीटा बनाम बेटी की बहस तेज हो गई।  बदलते वक़्त के साथ समाज की दकियानूसी सोच को अब बदलने की जरुरत है। जिस देश में 125 करोड़ लोग मिल कर एक बेटी की इज्जत नहीं बचा पाते, उस देश की दो बेटियों पी. वी. सिंधु और साक्षी मलिक ने रियो ओलम्पिक में 125 करोड़ देशवासियों की इज्जत बचा ली। यह भी संयोग था कि उस दिन रक्षाबंधन का पर्व था। जिस समाज में दहेज़ के नाम पर बहुओं से सोना लाने की आशा की जाती है, वह देश आज बेटियों  से गोल्ड की उम्मीद लगाये है ! इन सबको लेकर प्रिंट मिडिया से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया व वाट्सएप पर नारी-सशक्तिकरण और बेटियों के पक्ष में बड़ी अच्छी-अच्छी बातें सुनने को मिलीं, उनमें से कुछेक यहाँ शेयर कर रही हूँ -

सिंधु, साक्षी तुमने मेडल जीता
देश झूम कर नाचा है
तुमने भ्रूण हत्यारों के
चेहरे पे जड़ा तमाचा है
आज ख़ुशी से नाच रहे 
साक्षी-सिंधु चिल्लाते हो
अपने घर में बेटी जन्मे
फिर क्यों मुँह लटकाते हो?
रियो ओलम्पिक में भारत ने
दो मेडल ही पाया है
और ये दोनों मेडल भी
बेटियों ने ही लाया है
आज इन्हीं बेटियों के आगे
जनमानस नतमस्तक है
आज इन्हीं के कारण ही 
भारत का ऊँचा मस्तक है
आज ख़ुशी से झूम रहे हो
अच्छी बात है झूमो-गाओ
लेकिन घर में बेटी जन्मे 
तब भी इतनी खुशी मनाओ
बेटियाँ कम नहीं किसी से
शक्ति का अवतार हैं
इनको जो सम्मान न दे
उसका जीना धिक्कार है !!

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हुआ कुम्भ खेलों का आधा, हाथ अभी तक खाली थे।
औरों की ही जीत देख हम, पीट रहे क्यों ताली थे।
सवा अरब की भीड़ यहाँ पर, गर्दन नीचे डाले थी।
टूटी फूटी आशा अपनी, मानो भाग्य हवाले थी।
मक्खी तक जो मार न सकते, वे उपदेश सुनाते थे।
जूझ रहे थे उधर खिलाड़ी, लोग मज़ाक उड़ाते थे।
कोई कहता था भारत ने, नाम डुबाया खेलों में।
कोई कहता धन मत फूंको, ऐसे किसी झमेलों में।
कोई कहता मात्र घूमने, गए खिलाड़ी देखो तो।
कोई कहता भारत की है, पंचर गाड़ी देखो तो।
बस क्रिकेट के सिवा न जिनको, नाम पता होगा दूजा।
और वर्ष भर करते हैं जो, बस क्रिकेट की ही पूजा।
चार साल के बाद उन्हें फिर नाक कटी सी लगती है।
पदक तालिका देख देख कर, शान घटी सी लगती है।
आज देश की बालाओं ने, ताला जड़ा सवालों पर।
कस के थप्पड़ मार दिया है, उन लोगों के गालों पर।
बता दिया है जब तक बेटी, इस भारत की जिंदा हैं।
यह मत कहना भारत वालो, हम खुद पर शर्मिंदा हैं।
शीश नहीं झुकने हम देंगी, हम भारत की बेटी हैं।
आन बान की खातिर तो हम, अंगारों पर लेटी हैं।
भूल गए यह कैसे रक्षा-बंधन आने वाला है।
बहिनों के मन में पावन, उत्साह जगाने वाला है।
भैया रहें उदास भला फिर, कैसे राखी भाती ये।
पदकों के सूखे में पावस, कैसे भला सुहाती ये।
दो-दो पदकों की यह राखी, बाँधी, देश कलाई पर।
इतना तो अहसान सदा ही, करती बहिना भाई पर।
आज साक्षी के भुजदंडों, ने सबको ललकारा है।
अगर हौसला दिल में है तो, पूरा विश्व हमारा है।
पीवी संधू के तेवर हैं,  जैसे लक्ष्मीबाई हो।
अपनी भाई की खातिर ज्यों, बहिन युद्ध में आई हो।
जिनको अबला कहा वही तो, सबला बन छा जातीं हैं।
अपने मन में ठान लिया वह, पूरा कर दिखलाती हैं !!

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ऋणी रहेगा देश सिंधु, साक्षी, इस राखी के उपहार का
बहनों के सर जिम्मा हैं अब राष्ट्र के विस्तार का
मांस-मीट की ताकत फिर से दूध-दही से हारी हैं
हिन्दुस्तान में  साबित हो गया बेटी बेटों पर भारी हैं
करते रहे गुनाह हम, केवल बेटे के शौक में
कितने मेडल मार दिए, जीते जी ही कोख में
चमक रहीं है बेटियाँ, बन माथे का बिंदु 
बढ़ा रहीं सम्मान देश का, साक्षी और सिंधु !!

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एक बानगी यह भी..... 

Days are really changing fast in India. 
Earlier women used to win beauty contests and men used to be wrestling champions.
Now the roles have reversed. 
Rohit Khandelwal was Mr World 2016
While Sakshi is wrestling champion in 2016 Olympics
Food for thought....
Sindhu won silver !!
Sakshi won bronze !!

इस तरह के विचारों और भावों को सुनना बहुत सुकूनदायी लगता है।  पर, दुर्भाग्यवश इस तरह की बातों का ज्वार बेहद अल्प होता है।  कुछेक समय बाद, फिर से वही पुराना ढर्रा आरम्भ हो जाता है। "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" जैसी चीजें नारों तक ही सीमित रह जाती हैं। जरूरत है कि आज के दौर की सच्चाई को स्वीकार किया जाये और बेटियों को सशक्त करके राष्ट्र को भी सशक्त किया जाये !!

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

हमारे घर आँगन आज सावन आया है...




चना ज़ोर गरम और पकौड़े  प्याज़ के ...
चार दिन मे सूखेंगे कपड़े ये आज के ...

आलस और खुमारी बिना किसी काज के ...
टर्राएँगे मेंढक फिर बिना किसी साज़ के ...

बिजली की कटौती का ये मौसम आया है ...
हमारे घर आँगन आज सावन आया है ...

भीगे बदन और गरम चाय की प्याली ...
धमकी सी गरजती बदली वो काली ...

नदियों सी उफनती मुहल्ले की नाली ...
नयी सी लगती वो खिड़की की जाली ...

छतरी और थैलियों का मौसम आया है ...
हमारे घर आँगन आज सावन आया है ...

निहत्थे से पौधों  पे बूँदो का वार ...
हफ्ते मे आएँगे अब दो-तीन इतवार ...

पानी के मोतियों से लदा वो मकड़ी का तार...
मिट्टी की खुश्बू से सौंधी वो फुहार ...

मोमबत्तियाँ जलाने का मौसम आया है...
हमारे घर आँगन आज सावन आया है ...!


सावन में पेड़ों पर पड़ने वाले झूले तो अब गुजरे ज़माने की बातें हो गई। नई पीढ़ी अब झूलों का आनंद या तो घर में लेती है या पार्कों में। 

(चित्र में : बिटिया अपूर्वा झूले का आनंद लेती हुई) 




शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

संघर्षों से भरा रहा महाश्वेता देवी का जीवन

कुछ नाम किसी परिचय के मोहताज़ नहीं होते। उन्हीं में से एक नाम है - मशहूर लेखिका, साहित्यकार,  समाजसेविका और आंदोलनधर्मी और  महाश्‍वेता देवी का।  साहित्‍य अकादमी, ज्ञानपीठ अवार्ड, रेमन मैग्‍सेसे और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित महाश्‍वेता देवी को आदिवासी लोगों के लिए काम करने के लिए भी जाना जाता है। 

महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी  1926 को उस समय के पूर्वी  बंगाल (अब बांग्लादेश) के ढाका शहर में हुआ था। उनके पिता मनीष घटक भी कवि और उपन्यासकार थे। उनकी माँ धारित्री लेखिका और समाजसेविका थीं। तभी तो महाश्वेता देवी को साहित्य और समाज सेवा विरासत में मिली थी। 1944 में महाश्वेता देवी ने कोलकाता (तब कलकत्ता) के आशुतोष कॉलेज से इंटरमीडिएट किया। 1946 में  शांतिनिकेतन से अंग्रेजी में बीए (ऑनर्स) और कोलकाता यूनिवर्सिटी से एमए करने के बाद उन्होंने एक अध्यापक और पत्रकार के रूप में करियर शुरू किया। वे कोलकाता यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की लेक्चरर रहीं। 1984 में उन्होंने यहां से इस्तीफा दे दिया और लेखन में सक्रिय हो गईं।

महाश्वेता देवी की पहली रचना 'झांसी की रानी' थी । उनकी शुरुआती तीन कृतियां स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित थीं। उनकी लघुकथाओं में मीलू के लिए, मास्टर साब, कहानियों में  स्वाहा, रिपोर्टर, वॉन्टेड, उपन्यास में नटी, अग्निगर्भ, झांसी की रानी, हजार चौरासी की मां, मातृछवि, जली थी अग्निशिखा, जकड़न
और आलेख विधा में अमृत संचय, घहराती घटाएं, भारत में बंधुआ मजदूर, ग्राम बांग्ला, जंगल के दावेदार कृतियाँ चर्चित हैं। 

महाश्वेता देवी को दौलत से जरा भी लगाव नहीं था। सम्मान में मिली राशि भी वे समाज सेवा के लिए ही खर्च करतीं। नेल्सन मंडेला के हाथों प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने के बाद इसके साथ मिले पांच लाख रुपए का चेक उन्होंने पुरुलिया आदिवासी समिति को दे दिया था। पश्चिम बंगाल की 'लोधास' और 'शबर' जनजातियों के लिए उन्होंने काफी काम किया। महाश्वेता देवी की नौ में से आठ कहानियां आदिवासियों पर ही लिखी गई हैं। झारखंड (पूर्व में बिहार का हिस्सा रहे) में बंधुआ मजूदरी के खिलाफ आवाज उठाने के लिए वे आदिवासी क्षेत्रों में बार-बार जाती थीं। झारखंड के आदिवासियों की हालत में सुधार दिखा तो उन्होंने पुरुलिया के आदिवासियों के लिए संघर्ष शुरू कर दिया। वहां उन्होंने कई गांवों में कम्युनिटी सेंटर और आदिवासी सेंटर बनाए। गुजरात के गणेश देवी और महाराष्ट्र के लक्ष्मण गायगवाड़ के साथ मिलकर देशभर में घुमंतू जनजाति के लिए DNT-RAG (डिनोटिफाइड एंड नोमेडिक ट्राइब्स राइट्स एंड एक्शन ग्रुप) बनाया।

महाश्वेता देवी को साहित्य और समाज सेवा के लिए तमाम पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1986 में पद्मश्री, 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1997 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार और 2006 में पद्मविभूषण मिला। उनकी कई कृतियों पर फिल्मों का भी निर्माण हुआ। अमिताभ बच्चन और रेखा के साथ 1981 में रिलीज हुई 'सिलसिला' के 17 साल बाद जया बच्चन ने महाश्वेती देवी के उपन्यास 'हजार चौरासी की मां' पर बनी फिल्म  के जरिए ही बॉलीवुड में वापसी की थी। गौरतलब है कि  मार्च 1998 में जारी  हुई इस फिल्म का निर्देशन गोविंद निहलानी ने किया था। इसमें जया बच्चन के अलावा अनुपम खेर और नंदिता दास भी थे।

महाश्वेता देवी का खुद का जीवन भी झंझावतों और संघर्षों से भरा रहा।  की दो शादियाँ हुईं। 1947 में मशहूर रंगकर्मी विजन भट्टाचार्य से उनकी शादी हुई। विजन से शादी के बाद महाश्वेता देवी के परिवार को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। दरअसल, विजन कम्युनिस्ट थे और उस समय कम्युनिस्टों को रोजगार मुश्किल से मिलता था। तब 1948 में महाश्वेता देवी ने पदमपुकुर इंस्टीट्यूशन में अध्यापन  करके घर का खर्च चलाया। 1949 में महाश्वेता देवी को केंद्र सरकार के डिप्टी अकाउंटेंट जनरल, पोस्ट एंड टेलिग्राफ ऑफिस में अपर डिवीजन क्लर्क की नौकरी मिली, लेकिन पति कम्युनिस्ट थे, इसलिए उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद महाश्वेता देवी ने साबुन बेचकर और ट्यूशन पढ़ाकर घर का खर्च चलाया। बाद में 1957 में स्कूल में टीचर की नौकरी लगी।
शादी के 15 साल बाद 1962 में विजन भट्टाचार्य से उनका तलाक हो गया। विजन से उन्हें एक बेटा नवारुण भट्टाचार्य है। असीत गुप्त से दूसरी शादी हुई, लेकिन 1975 में उनसे भी तलाक हो गया।

इसमें कोई शक नहीं कि महाश्वेता देवी का पूरा जीवन ही संघर्षों से भरा रहा।  यही कारण था कि संघर्षों से वे कभी घबराई नहीं और समाज के निचले समाज के लिए सदैव संघर्षरत भी रहीं। 28 जुलाई, 2016  को उन्होंने अंतिम सास ली। अपने ही अंदाज में जीने वालीं महाश्वेता सिर्फ पन्नों पर ही शब्द नहीं उकेरती थीं बल्कि उसे आंदोलन की भावभूमि देने का सत्साहस भी रखती थीं। ऐसे में उनका जाना न सिर्फ साहित्य बल्कि समाज के लिए भी एक गहरी क्षति है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे .... विनम्र श्रद्धांजलि !!

शनिवार, 23 जुलाई 2016

क्रन्तिकारी चन्द्रशेखर 'आजाद' और इलाहाबाद से जुड़ी उनकी यादें


भारत की फिजाओं को सदा याद रहूँगा 
आज़ाद था, आज़ाद हूँ, आज़ाद रहूँगा !


आज चन्द्रशेखर 'आजाद' (23 जुलाई, 1906 - 27 फरवरी, 1931) की आज 110 वीं जयंती है। ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अत्यन्त सम्मानित और लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी रहे आज़ाद पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल व सरदार भगत सिंह सरीखे महान क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे। इलाहाबाद में उनका अंतिम समय गुजरा और यहीं की मिट्टी में उन्होंने अंतिम साँस ली। आज भी कंपनी गार्डेन में लगी उनकी भव्य मूर्ति उनके जीवन को प्रतिबिंबित करती है। वाकई वो अंत तक आज़ाद ही रहे। 

चन्द्रशेखर 'आजाद' की जयंती पर शत-शत नमन !!


अमर शहीद चन्द्र शेखर आजाद की 27 फरवरी, 1931 की अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद में पुलिस से हुई मुठभेड़ में प्रयुक्त पिस्तौल जो तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, इलाहाबाद सर जॉन नाट बावर के सौजन्य से प्राप्त हुई थी। इसे इलाहाबाद संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। 

!! स्वतंत्रता संग्राम के क्रन्तिकारी नायक चन्द्रशेखर आज़ाद जी की 110वीं जयंती पर उन्हें शत-शत नमन !!


शनिवार, 16 जुलाई 2016

नेपाल की पहली महिला मुख्‍य न्‍यायाधीश बनीं सुशीला कार्की

भारत में सर्वोच्च न्यायालय के शीर्ष पद पर भले ही कोई महिला अब तक नहीं पहुँची हो, पर पड़ोसी देश नेपाल में भारत के ही बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से राजनीति शास्त्र में मास्‍टर डिग्री लेने वाली सुशीला कार्की मुख्य न्यायाधीश के पद पर आसीन हुई हैं । पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में विद्या देवी भंडारी और पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष ओनसारी घरती के बाद शीर्ष पद पर किसी महिला की यह तीसरी नियुक्ति है। इसी के साथ नेपाल में राष्ट्रपति, संसद की स्पीकर और सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश, इन तीनों महत्वपूर्ण पद पर महिलाएं आसीन हैं, जो कि नारी-सशक्तिकरण के लिहाज से भी ऐतिहासिक पल है।

नेपाल की न्यायपालिका के 64 साल के इतिहास में पहली बार किसी महिला ने मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला है। 64 वर्षीय सुशीला कार्की ने 11 जुलाई, 2016 को देश के 25वें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली। कार्की के नाम की सिफारिश 10 अप्रैल को प्रधानमंत्री केपी ओली की अध्यक्षता वाली संवैधानिक परिषद ने की थी। कार्की को राष्ट्रपति ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। वह पिछले तीन महीने से कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के तौर पर काम कर रही थीं। विशेष संसदीय समिति ने 10 जुलाई, 2016  को उनके नाम पर मुहर लगाई। नेपाल में किसी संवैधानिक पद पर नियुक्ति के लिए इस समिति की मंजूरी जरूरी होती है। कार्की न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहिष्णुता के लिए जानी जाती हैं।

7 जून 1952 को बिराटनगर के पास एक गांव में जन्मीं कार्की की पहचान भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करने वाली और बिना किसी दबाव के फैसला सुनाने वाले जज के तौर पर रही है। कार्की अपने पिता की सात संतानों में सबसे बड़ी हैं। इनका सम्बन्ध किसान परिवार से है। उनका भारत से भी गहरा नाता रहा है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से सन 1975 में राजनीति शास्त्र में मास्‍टर डिग्री लेने वाली सुशीला कार्की ने वर्ष 1978 में त्रिभुवन विश्वविद्यालय, नेपाल से विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त की। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में अध्ययन के दौरान ही  नेपाली कांग्रेस के प्रसिद्ध युवा नेता दुर्गा प्रसाद सुवेदी से मिलने के पश्चात इनका विवाह दुर्गा प्रसाद सुवेदी से हुआ। प्रारम्भ में कार्की ने शिक्षण कार्य किया। 1979 में यह वकालत पेशे में आईं। सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश नियुक्ति होने पहले कार्की सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठतम् न्यायाधीश थीं। 22 जनवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट की अस्थायी जज बनीं और 18 नवंबर 2010 को स्थायी जज बन गईं। 

- आकांक्षा यादव : Akanksha Yadav @ शब्द-शिखर : http://shabdshikhar.blogspot.in/

शुक्रवार, 24 जून 2016

नारी सशक्तिकरण की ओर एक कदम और : देश की पहली महिला फाइटर पायलट बनीं मोहना-भावना-अवनी, उड़ाएंगीं सुखोई और तेजस जैसे लड़ाकू विमान

अब जंग के मैदान में महिलाएं भी तेज रफ्तार से उड़ते लड़ाकू विमानों में कलाबाजियां करेंगी। जमीन से हजारों फीट ऊपर लड़ाकू विमानों की तेज रफ्तार और आवाज के बीच जल्द ही नजर आएगी नारी शक्ति। जल्द ही सुखोई और तेजस जैसे फाइटर प्लेन उड़ाती दिखेंगी हमारे देश की तीन जांबाज लड़कियां। जी हां, भारतीय वायुसेना के इतिहास में 18 जून, 2016  का दिन बेहद अहम है। इस दिन पहली बार तीन महिला अधिकारी वायुसेना में भारत की पहली महिला लड़ाकू पायलट के तौर पर शामिल की गईं। ये फाइटर पायलट हैं भावना कांथ (बिहार), अवनि चतुर्वेदी (मध्यप्रदेश) और मोहना सिंह (राजस्थान)।

तीनों  महिला अधिकारियों का चयन लड़ाकू विमान उड़ाने वाली नभयोद्धाओं की टीम के लिए हुअा है  जहां अब तक केवल पुरुषों का एकाधिकार था। महिलाएं वायुसेना में अब तक केवल ट्रांसपोर्ट विमान और हेलीकॉप्टर ही उड़ाती रहीं हैं। मगर अब देश को तीन पहली वुमन फाइटर पायलट मिल जाएंगी।  ये तीन महिला पायलट सुखोई और तेजस जैसे लड़ाकू विमानों को उड़ाती नजर आएंगी। इन तीनों पायलटों ने ट्रेनिंग का पहला चरण पूरा कर लिया है और कमीशंड होने के बाद कर्नाटक के बीदर में एडवांस ट्रेनिंग शुरू होगी। गौरतलब है कि  पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान में 3 साल पहले यानि 2013 में महिला फाइटर पायलटों को शामिल किया गया था।

मध्यप्रदेश की हैं अवनी
अवनी चतुर्वेदी मूल रूप से मध्यप्रदेश के रीवा की रहने वाली हैं। उनके पिता एग्जीक्यूटिव इंजीनियर हैं। अवनी बताती है कि इस वजह से उसने आर्मी की लाइफ को करीब से देखा है। फाइटर पायलट बनने का मौका मिला तो परिवार से काफी सपोर्ट मिला। उन्होंने हर कदम पर उसे प्रोत्साहित किया।

राजस्थान से आती हैं मोहना
राजस्थान के झुंझुनूं जिले की मोहना सिंह ने दिल्ली के एयरफोर्स स्कूल से अध्ययन करने वाली मोहना सिंह के पिता भी भारतीय वायुसेना में हैं। भावना ने एमएस कॉलेज बेंगलुरु से बीई इलेक्ट्रिल और अवनी चतुर्वेदी ने राजस्थान के टॉक जिले में वनस्थली विद्यापीठ से कंप्यूटर साइंस की डिग्री हासिल की है। अवनी चतुर्वेदी, भावना कांथ और मोहना सिंह ने मार्च में ही लड़ाकू विमान उड़ाने की योग्यता हासिल कर ली थी। इसके बाद उन्हें युद्धक विमान उड़ाने का गहन प्रशिक्षण दिया गया। 

बिहार के साधारण परिवार से हैं भावना
बिहार के दरभंगा ज़िले के घनश्यामपुर प्रखंड के बाऊर गांव की निवासी भावना कांत बेहद साधारण परिवार से निकल कर आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंची हैं। उनके दादा एक इलेक्ट्रिशियन, तो पिता मैकेनिक रहे हैं। भावना ने डीएवी स्कूल, बरौनी रिफ़ाइनरी, बेगूसराय से वर्ष 2009 में दसवीं की परीक्षा पास की थी। उन्होंने बीएमएस बेंगलुरू से वर्ष 2014 में बीटेक किया। पिछले साल उन्हें भारतीय वायु सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत शामिल किया गया था। 


ये तीनों महिलाएं रचने जा रहीं इतिहास
यह पहला मौका होगा, जब भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान की कॉकपिट में कोई महिला बैठेगी। इंडियन एयरफोर्स में फिलहाल 94 महिला पायलट हैं, लेकिन ये पायलट सुखोई, मिराज, जगुआर और मिग जैसे फाइटर जेट्स नहीं उड़ाती हैं। वायुसेना में लगभग 1500 महिलाएं हैं, जो अलग-अलग विभागों में काम कर रही हैं। 1991 से ही महिलाएं हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट उड़ा रही हैं, लेकिन फाइटर प्लेन से उन्हें दूर रखा जाता था।

भारतीय सेना में पहली बार किसी महिला को मिलिट्री नर्सिंग सर्विस के लिए वर्ष 1927 में शामिल किया गया था। वर्ष 1992 में तत्कालीन सरकार की मंजूरी के बाद सेना के तीनों अंगों में महिला अधिकारियों को शामिल किया जाने लगा। 

18 जून को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर हैदराबाद स्थित भारतीय वायुसेना अकादमी की पासिंग आउट परेड की जब सलामी लेने पहुंचें तो  इसी मौके पर तीन महिला पायलटों, भावना कांथा, अवनि चतुर्वेदी और मोहना सिंह को वायु सेना की लड़ाकू पायलट शाखा में विधिवत रूप से कमिशन हासिल हो गया । ये तीनों महिला अधिकारी पिछले एक साल से इस अकादमी में लड़ाकू पायलट के दूसरे चरण का प्रशिक्षण ले रही हैं। इनकी 6 महीने की ट्रेनिंग पिलेट्स ट्रेनर पर हुई और 6 महीने की ट्रेनिंग किरन ट्रेनर पर हुई। 55 घंटे पिलेट्स पर उड़ान भरने बाद 87 घंटे किरन ट्रेनर पर इन्होंने ट्रेनिंग ली। वायु सेना में कमीशन के बाद अब इन महिला पायलटों को बीदर में एक साल की एडवांस ट्रेनिंग एडवांस हॉक पर दी जायेगी और जून 2017 से ये लडाकू विमान उड़ाना  शुरू कर देंगी। पिछले एक साल से हैदराबाद में इनकी ट्रेनिंग सुबह 4 बजे से शुरू होकर रात 10 बजे तक चलती थी।

भारतीय वायुसेना में महिलाओं के विमान उड़ाना शुरू करने के करीब दो दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद अब वो लम्हा आया है जब वो लड़ाकू विमानों के जरिए आसमान में दुश्मनों को अपनी ताकत दिखाएंगी। 1991 में पहली बार महिला पायलटों ने हेलिकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट विमान उड़ाना शुरू किया। 2012 में 2 वुमन फ्लाइट लेफ्टिनेंट अलका शुक्ला और एमपी शुमाथि ने लड़ाकू हेलिकॉप्टर्स के लिए ट्रेनिंग पूरी की। पिछले साल एअरफोर्स डे यानी 8 अक्टूबर 2015 के दिन वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल अरूप राहा ने महिलाओं के लिए लड़ाकू पायलट स्ट्रीम भी खोलने का ऐलान किया।

भारतीय सेनाओं में अपनी जगह बनाने के लिए देश की आधी आबादी ने लंबी लड़ाई लड़ी है और कदम दर कदम सफलता के साथ हर मोर्चे पर अपना लोहा मनवाया है। फरवरी 2016 में राष्ट्रपति और तीनों सेनाओं के सुप्रीम कमांडर प्रणब मुखर्जी ने संसद में ऐलान किया था कि भारतीय सेनाओं में महिलाएं आगे चलकर सभी कॉम्बैट रोल्स निभाएंगीं। अब तीन महिला लड़ाकू पायलटों को कमीशन मिलने के बाद वो दिन दूर नहीं जब महिलाएं रणक्षेत्र में भी दुश्मन के छक्के छुड़ाने के लिए हर मोर्चे पर डटी नजर आएंगी।
-आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 

रविवार, 29 मई 2016

राजस्थानी भाषा में कविताएँ


अब हमारी कविताएँ राजस्थानी भाषा में भी। राजस्थानी पत्रिका ''माणक'' (मई 2016) में प्रकाशित हमारी कुछेक कविताएँ, जिनका हिंदी से राजस्थानी में अनुवाद जुगल परिहार ने किया है।  आभार !!


संपर्क -
माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) :  संपादक - पदम मेहता
माणक प्रकाशन, जालोरी गेट, जोधपुर (राजस्थान) -342003  

रविवार, 22 मई 2016

बोर्ड परीक्षाओं से लेकर आईएएस तक बेटियाँ ही टॉपर


बोर्ड परीक्षाओं से लेकर आईएएस तक बेटियाँ ही टॉप कर रही हैं। 
राजनीति में भी ममता बनर्जी और जयललिता पर लोगों ने फिर से विश्वास जताया है।
 फिर भी सबसे ज्यादा निशाने पर बेटियाँ/ नारियाँ ही होती हैं।  
......आखिर क्यों ??



रविवार, 15 मई 2016

अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस : : पारिवारिक मूल्यों को सहेजने की जरूरत

परिवार की महत्ता से कोई भी इंकार नहीं कर सकता। रिश्तों के ताने-बाने और उनसे उत्पन्न मधुरता, स्नेह और प्यार का सम्बल ही परिवार का आधार है। परिवार एकल हो या संयुक्त, पर रिश्तों की ठोस बुनियाद ही उन्हें ताजगी प्रदान करती है। आजकल रिश्तों को लेकर मातृ दिवस, पिता दिवस और भी कई दिवस मनाये जाते हैं, पर आज 15 मई को इन सबको एकीकार करता हुआ ''अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस'' मनाया जाता है। परिवार का साथ व्यक्ति को सिर्फ भावनात्मक रूप से ही नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक दृष्टि से भी मजबूत रखता है। परिवार के सदस्य ही व्यक्ति को सही-गलत जैसी चीजों के बारे में समझाते हैं।

उपभोक्तावाद एवं अस्त-व्यस्त दिनचर्या के इस दौर में जहाँ कुछ लोग अपने को एकाकी समझकर तनाव, डिप्रेशन और कभी-कभी तो आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं, वहीँ कुछ लोग अपने काम को इतनी प्राथमिकता देने लगते हैं कि परिवार के महत्व को ही पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं। एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में वे ना तो अपने माता-पिता को समय दे पाते हैं और ना ही अपने वैवाहिक जीवन के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में सक्षम होते हैं।

ऐसे में एक तरफ जहाँ परिवार के लोगों की वैयक्तिक जरूरतों के साथ सामूहिकता का तादात्मय परिवार को एक साथ रखने के लिए बेहद जरूरी है, वहीँ परिवार और काम के बीच का संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के लिए उसका परिवार बहुत महत्वपूर्ण होता है। व्यक्ति के जीवन को स्थिर और खुशहाल बनाए रखने में उसका परिवार बेहद अहम भूमिका निभाता है।

सो, आप सभी लोग अपने परिवार के साथ विशेष रूप से आज का दिन इंजॉय करें और wish you all a very-very Happy International Family day !!

-आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 

रविवार, 8 मई 2016

मदर्स डे पर बाल-गीत : मम्मी मेरी सबसे प्यारी




मम्मी मेरी सबसे प्यारी,
मैं मम्मी की राजदुलारी।
मम्मी मुझसे प्यार जताती,
अच्छी-अच्छी चीजें लाती।

करती जब भी मैं मनमानी,
मम्मी याद दिलाती नानी।
फिर मम्मी करती है प्यार,        
मेरा भी गुस्सा बेकार।

पीछे-पीछे मम्मी आती,
चाॅकलेट दे मुझे मनाती।
थपकी देकर लोरी गाती,
निंदिया प्यारी मुझको आती।


माँ होने का एहसास दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास है। सिर्फ एक दिन ही क्यों, यह तो हर पल जीने वाला एहसास है !! Proud to be mother of two lovely daughters.

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

''शब्द-शिखर'' पर ब्लॉगिंग का सफरनामा : पाँच शतक का आँकड़ा पार

हिंदी ब्लॉगिंग ने अपना एक लम्बा सफर तय किया है। कभी दो-चार पंक्तियों से आरम्भ हुए हिंदी ब्लॉग ने वक़्त के साथ रफ़्तार पकड़ी और आम जन के साथ तमाम नामी-गिरामी लोगों के लिए अपनी बात कहने का माध्यम बन गया हिंदी ब्लॉग। यह संयोग ही हैं कि अभी 21 अप्रैल, 2016 को हिंदी ब्लॉग ने 13 साल पूरे किये हैं और ठीक उसके एक दिन बाद 22 अप्रैल, 2016 को हमने अपने ब्लॉग शब्द-शिखर पर प्रकाशित पोस्टों का पाँच शतक पूरा किया है अर्थात शब्द-शिखर पर पाँच सौ पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं।  

20  नवंबर, 2008 को आरम्भ हुआ शब्द-शिखर ब्लॉग भी लगभग साढ़े सात साल का सफर तय कर चुका है।आज शब्द-शिखर ब्लॉग पर 500 पोस्ट प्रकाशित हैं, जिन पर 6,700 से ज्यादा प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं। कुल पृष्ठ दृश्य 2 लाख से भी ज्यादा हैं। दुनिया के लगभग 100 से ज्यादा देशों से किसी न किसी रूप में लोगों ने शब्द-शिखर ब्लॉग को देखा-पढ़ा या विजिट किया है। शब्द-शिखर को  363 लोग फॉलो करते हैं और इसे और भी समृद्ध बनाते हैं।  इसमें कोई शक नहीं कि इस ब्लॉग ने हमें बहुत सम्मान दिया। उस दौर में जबकि फेसबुक के पदार्पण के बाद हर कोई हिंदी ब्लॉग को बीते हुए दौर की बात मानकर, इसका मोह छोड़ रहा था, उस दौर में भी हम इससे अपना मोह नहीं छुड़ा पाये। बीच में एक दौर ऐसा भी आया कि कुछेक पोस्टों पर प्रतिक्रियाएं लगभग शून्य ही थीं और ब्लॉग की पठनीयता भी घट रही थी। पर ज्यादा दिन नहीं बीता, और धीरे-धीरे सब कुछ सहज हो गया।



"शब्द-शिखर" ब्लॉग की तमाम पोस्टों को जहाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला,राष्ट्रीय सहारा, राजस्थान पत्रिका, आज समाज, गजरौला टाईम्स, जन सन्देश, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, दस्तक, आई-नेक्स्ट, IANS द्वारा जारी फीचर में स्थान दिया गया, वहीं इस ब्लॉग से तमाम रचनाएँ लेकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ने प्रकाशित भी कीं। 

अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, लखनऊ (27 अगस्त, 2012) में हिंदी ब्लॉग के एक दशक पूरा होने पर परिकल्पना समूह द्वारा जहाँ ’दशक के श्रेष्ठ ब्लागर दम्पत्ति' के रूप में हमें (कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव) सम्मानित किया गया, वहीँ अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, काठमांडू, नेपाल (13-14 सितंबर 2013) में  ”परिकल्पना ब्लॉग विभूषण सम्मान” और श्री लंका में आयोजित पंचम अंतर्राष्ट्रीय ‪ब्लॉगर‬ सम्मेलन (23-27 मई 2015) में "परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान" से सम्मानित किया गया।  

‘न्यू मीडिया एवं ब्लागिंग’ में उत्कृष्टता के लिए  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने 1 नवम्बर, 2012 को हमें ( आकांक्षा यादव-कृष्ण कुमार यादव) अवध सम्मान से विभूषित किया। जी न्यूज़ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन ताज होटल, लखनऊ में किया गया था, जिसमें विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित किया गया, पर यह पहली बार हुआ जब किसी दम्पति को युगल रूप में यह प्रतिष्ठित सम्मान दिया गया। 


ब्लॉगिंग के चलते ही हमें हिंदुस्तान टाइम्स वुमेन अवार्ड के लिए भी नामांकित किया गया, जहाँ फिल्म अभिनेत्री शबाना आज़मी, संगीतकार वाजिद खान, सांसद डिम्पल यादव ने सम्मानित किया। 



इसी क्रम में डॉयचे वेले की बॉब्स - बेस्ट ऑफ ऑनलाईन एक्टिविज्म प्रतियोगिता-2015  में इंटरनेट यूजरों ने  'पीपुल्स चॉइस अवॉर्ड' श्रेणी में  'शब्द-शिखर' (www.shabdshikhar.blogspot.in/) ब्लॉग  को हिंदी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग के रूप में चुना। हिंदी सहित 14 भाषाओं में पीपुल्स चॉइस अवॉर्ड के तहत एक-एक सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग चुना गया, जिसमे कुल मिला कर करीब 30,000 वोट डाले गए। ज्यूरी ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि, ''आकांक्षा यादव साहित्य, लेखन और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं।  उन्हें हिन्दी में ब्लॉग लिखने वाली शुरुआती महिलाओं में गिना जाता है।  आकांक्षा महिला अधिकारों पर लिखना पसंद करती हैं।  अपने ब्लॉग में वह अपने निजी अनुभव और कविताएं भी शामिल करती हैं।''  विजेताओं को 23 जून को जर्मनी के बॉन शहर में होने वाले ग्लोबल मीडिया फोरम के दौरान पुरस्कृत किया गया।  

निश्चितत:, यह आप सभी का स्नेह ही है जो कि "'शब्द-शिखर" ब्लॉग को जीवंत और समृद्ध बनाए हुए है। आज हम उन सभी लोगों को धन्यवाद देते हैं जिन्होंने हिंदी ब्लागिंग में शब्द-शिखर को इस मुकाम तक पहुँचाया !! 

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आज के दिन 20 नवंबर, 2008  को लिखी अपनी पहली पोस्ट 'ब्लागिंग' और 'एस.एम.एस.'  को पुन: प्रकाशित कर रही हूँ, जहाँ से हमने ब्लॉगिंग का शुभारम्भ किया था -

ब्लॉगिंग आज के दौर की विधा है. पत्र-पत्रिकाओं से परे ब्लॉग-जगत का अपना भरा-पूरा संसार है, रचनाधर्मिता है, पाठक-वर्ग है. कई बार बहुत कुछ ऐसा होता है, जो हम चाहकर भी पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से नहीं कह पाते, ब्लॉगिंग  उन्हें स्पेस देता है. कहते हैं ब्लॉगिंग एक निजी डायरी की भांति है, एक ऐसी डायरी जहाँ आप अपनी भावनाएं सबके समक्ष रखते हैं, उस पर तत्काल प्रतिक्रियाएँ प्राप्त करते हैं और फिर संवाद का दायरा बढ़ता जाता है. संवाद से साहित्य और सरोकारों में वृद्धि होती है. जरूरी नहीं कि हम जो कहें, वही सच हो पर कहना भी तो जरूरी है. यही तो लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया है. ब्लॉगिंग  भी उस लोकतंत्र की दिशा में एक कदम है, जहाँ हम अपने भाव बिना किसी सेंसर के, बिना किसी एडिटिंग के, बिना किसी भय के व्यक्त कर सकते हैं...पर साथ ही साथ यह भी जरूरी है कि इसका सकारात्मक इस्तेमाल हो. हर तकनीक के दो पहलू होते हैं- अच्छा और बुरा. जरुरत अच्छाई की हैं, अन्यथा अच्छी से अच्छी तकनीक भी गलत हाथों में पड़कर विध्वंसात्मक रूप धारण कर लेती है.

इसी क्रम में मैं आज ब्लॉगिंग  में कदम रख रही हूँ. मेरी कोशिश होगी कि एक रचनाधर्मी के रूप में रचनाओं को जीवंतता के साथ सामाजिक संस्कार देने का प्रयास करूँ. यहाँ बिना लाग-लपेट के सुलभ भाव-भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें, यही मेरी लेखनी और ब्लॉगधर्मिता की शक्ति होगी.

 मैंने अपने ब्लॉग का नाम 'शब्द-शिखर' रखा है, क्योंकि शब्दों में बड़ी ताकत है. ये शब्द ही हमें शिखर पर भी ले जाते हैं. शब्दों का सुन्दर चयन और उनका सुन्दर प्रयोग ही किसी रचना को महान बनता है. मेर इस ब्लॉग पर होंगीं साहित्यिक रचनाएँ, मेरे दिल की बात-जज्बात, सरोकार, वे रचनाएँ भी मैं यहाँ साभार प्रकाशित करना चाहूँगीं, जो मुझे अच्छी लगती हैं.

-आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

एक पत्नी का रोजनामचा

बेवक़ूफ़
वो
रोज़ाना की तरह
आज फिर ईश्वर का नाम लेकर उठी.
किचिन में आई
और चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाया.
फिर
बच्चों को जगाया
ताकि वो स्कूल के लिए तैयार हो सकें.
फिर
उसने किचिन में
जाकर चाय निकाली
अपने सास ससुर को देकर आयी,
फिर
उसने बच्चों का
नाश्ता तैयार किया
और बीच-बीच में बच्चों को ड्रेस पहनाई,
और
फिर बच्चों को
नाश्ता कराकर उनके
स्कूल का लंच तैयार करने लगी.
इस बीच
बच्चों के स्कूल का
रिक्शा आ गया..
वो
बच्चों को
रिक्शा तक छोड़ कर आई.
वापस आकर
मेज़ से बर्तन इकठ्ठा किये.
इसी बीच
पतिदेव की आवाज़ आई कि मेरे कपङे निकाल दो.

उनको
ऑफिस जाने लिए
कपड़े निकाल कर दिए,
और
वापस आकर
फिर पति के लिए
नाश्ता तैयार करने लगी.
अभी
पति के लिए
उनकी पसन्द का
नाश्ता अण्डा और पराठे तैयार करके टेबिल पर लगाया ही था,
कि
छोटी ननद आई
और ये कहकर कि भाभी मुझे आज कॉलेज जल्दी जाना है,
नाश्ता उठा कर ले गयी.
वो
फिर एक
हल्की सी मुस्कराहट के साथ वापस किचिन में आई.
इतने में
देवर की आवाज़ आई
भाभी नाश्ते तैयार हो गया क्या..?
"जी भाई अभी लायी..!"
ये कहकर
उसने फिर से
अपने पति और देवर के लिए अॉमलेट और पराठे तैयार करने शुरू किये.
"लीजिये नाश्ता तैयार है..!"
पति और देवर ने
नाश्ता किया और अखबार पढ़कर अपने-अपने ऑफिस के लिए निकल चले.
उसने
मेज़ पर से
खाली बर्तन समेटे
और सास-ससुर के लिए
उनका परहेज़ का नाश्ता तैयार करने लगी..
दोनों को
नाश्ता कराने के बाद
फिर बर्तन इकट्ठे किये
और उनको भी किचिन में लाकर धोने लगी..
इसबीच
सफाई वाली भी आ गयी.
उसने
बर्तन का काम
सफाई वाली को सौंप कर खुद बेड की चादरें वगैरह इकट्ठा करने पहुँच गयी.
और फिर
सफाई वाली के साथ
मिलकर सफाई में जुट गयी.
अब तक 11 बज चुके थे.
अभी
वो पूरी तरह
काम समेट भी ना पायी थी कि कॉलबेल बजी.

दरवाज़ा खोला
तो सामने बड़ी ननद
और उसके पति व बच्चे सामने खड़े थे.
उसने
ख़ुशी-ख़ुशी
सभी को आदर के साथ घर में बुलाया,
और
उनसे बातों में
उनके आने की ख़ुशी का इज़हार करती रही.
ननद की
फ़रमाइश के मुताबिक़
नाश्ता तैयार करने के बाद
अभी वो ननद के पास बैठी ही थी...
कि
सास की आवाज़ आई
"बहू खाने का क्या प्रोग्राम है..?"
उसने घडी पर
नज़र डाली तो 12 बज रहे थे.

उसकी
फ़िक्र बढ़ गयी
वो जल्दी से फ्रिज़ की तरफ लपकी
और
सब्ज़ी निकाली
फिर से दोपहर के
खाने की तैयारी में जुट गयी.
खाना
बनाते-बनाते
अब दोपहर का एक बज चुका था.
बच्चे
स्कूल से आने वाले थे.
लो बच्चे आ गये...
उसने
जल्दी-जल्दी
बच्चों की ड्रेस उतारी
और उनका मुँह-हाथ धुलवाकर उनको खाना खिलाया.
इसी बीच
छोटी ननद भी
कॉलेज से आ गयी
और देवर भी आ चुके थे.
उसने
सभी के लिए
मेज़ पर खाना लगाया
और खुद रोटी बनाने में लग गयी.
खाना खाकर
सब लोग फ्री हुए
तो उसने मेज़ से फिर
बर्तन जमा करने शुरू कर दिये.
इस वक़्त तीन बज रहे थे.
अब
उसको
खुद को भी
भूख का एहसास होने लगा था.
उसने
हॉट-पॉट देखा
तो उसमे कोई रोटी नहीं बची थी.
उसने
फिर से
किचिन की ओर रुख किया .
तभी
पतिदेव घर में
दाखिल होते हुये बोले कि
आज
देर हो गयी
भूख बहुत लगी है
जल्दी से खाना लगा दो.
उसने
जल्दी-जल्दी
पति के लिए खाना बनाया
और
मेज़ पर
खाना लगा कर
पति को किचिन से गर्मागर्म रोटियाँ बनाकर
ला-ला कर देने लगी.
अब तक चार बज चुके थे..
अभी वो
खाना खिला ही रही थी
कि पतिदेव ने कहा कि आ जाओ तुम भी खालो.
उसने
हैरत से
पति की तरफ देखा
तो उसे ख्याल आया कि
आज मैंने सुबह से कुछ खाया ही नहीं.
इस ख्याल के
आते ही वो पति के
साथ खाना खाने बैठ गयी.
अभी
पहला निवाला
उसने मुँह में डाला ही था की आँख से आँसू निकल आये.
पतिदेव ने
उसके आँसू देखे
तो फ़ौरन पूछा कि
तुम क्यों रो रही हो...?
वो खामोश रही
और सोचने लगी कि
इन्हें
कैसे बताऊँ कि
ससुराल में कितनी मेहनत के बाद ये रोटी का निवाला नसीब होता है
और लोग
इसे मुफ़्त की रोटी कहते हैं.
पति के
बार बार पूछने पर
उसने सिर्फ इतना कहा
कि
कुछ नहीं
बस ऐसे ही आँसू आ गये.
पति
मुस्कुराये और बोले
तुम
औरतें भी
बड़ी "बेवक़ूफ़" होती हो.
बिना वजह
रोना शुरू करदेती हो.
........... 
क्या वो 
वाकई बेवक़ूफ़ होती हैं..?

ज़रा सोचिये..
उन्हें 
ज्यादा कुछ नहीं
सहानुभूति और स्नेह 
के बस दो मीठे बोल चाहिये.

अपनी पत्नी को सम्मान दीजिए.... 

(यह सन्देश रूपी रचना वाट्सएप पर मिली।  किसने लिखा, इसका जिक्र नहीं ... पर जिसने भी लिखा दिल्लगी से लिखा.....साधुवाद ।  अच्छा लगा, अत: आप सभी के साथ शेयर कर रही हूँ)

- आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 
Akanksha Yadav @ http://shabdshikhar.blogspot.in/

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

हिंदी ब्लागिंग की 13वीं वर्षगाँठ : हिन्दी ब्लॉगिंग में एक परिवार के तीन सदस्यों ने बनाया कीर्तिमान

आज हिंदी ब्लागिंग की 13 वीं वर्षगाँठ है। यद्यपि वर्ष 1999 में आरम्भ हुआ ब्लॉग वर्ष 2016 में 17 साल का सफर पूरा कर चुका है। वर्ष 2003 में यूनीकोड हिंदी में आया और तद्नुसार हिन्दी ब्लॉग का भी आरम्भ हुआ। यद्यपि इससे पूर्व विनय जैन ने 19 अक्टूबर 2002 को अंग्रेजी ब्लॉग पर हिन्दी की कड़ी सर्वप्रथम आरंभ कर इसका आगाज किया था, पर पूर्णतया हिन्दी में ब्लॉगिंग आरंभ करने का श्रेय आलोक को जाता है, जिन्होंने 21 अप्रैल 2003 को हिंदी के प्रथम ब्लॉग ’नौ दो ग्यारह’ से इसका आगाज किया। यहाँ तक कि ‘ब्लॉग‘ के लिए ‘चिट्ठा‘ शब्द भी उन्हीं का दिया हुआ है। आज उन सभी लोगों को याद करते हैं और उन्हें धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने हिंदी ब्लागिंग को इस मुकाम तक पहुँचाया !! 

हैप्पी बर्थ-डे टू हिन्दी ब्लॉगिंग......इस अवसर पर उत्तर प्रदेश और राजस्थान के विभिन्न अख़बारों में प्रकाशित खबरों को भी आप सभी के साथ शेयर कर रही हूँ। 

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न्यू मीडिया के इस दौर में ब्लाॅगिंग लोगों के लिए अपनी बात कहने का सशक्त माध्यम बन चुका है। राजनीति की दुनिया से लेकर फिल्म जगत, साहित्य से लेकर कला और संस्कृति से जुड़े तमाम नाम ब्लॉगिंग से जुडे हुए हैं।  आज ब्लाॅग सिर्फ जानकारी देने का माध्यम नहीं बल्कि संवाद, प्रतिसंवाद, सूचना विचार और अभिव्यक्ति का भी सशक्त ग्लोबल मंच है।

यदयपि ब्लागिंग का आरंभ  1999 से माना  जाता है पर हिंदी में ब्लागिंग का आरम्भ वर्ष 2003 में हुआ। आज हिंदी में करीब एक लाख से ज्यादा ब्लॉग हैं और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग बखूबी इसके माध्यम से सक्रिय हैं। इनमें एक परिवार ऐसा भी है, जिसके सभी सदस्य हिंदी ब्लॉगिंग से जुड़े हुए हैं।  चर्चित हिंदी ब्लॉगर एवं सम्प्रति राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के  निदेशक  डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव बताते हैं कि पूर्णतया हिन्दी में ब्लाॅगिंग आरंभ करने का श्रेय आलोक को जाता है, जिन्होंने 21 अप्रैल 2003 को हिंदी के प्रथम ब्लॉग ’नौ दो ग्यारह’ से इसका आगाज किया। सार्क देशों के सर्वोच्च 'परिकल्पना ब्लॉगिंग सार्क शिखर सम्मान' से सम्मानित एवं नेपाल, भूटान और श्रीलंका सहित तमाम देशों में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मेलन में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले श्री यादव जहाँ अपने साहित्यिक रचनाधर्मिता हेतु "शब्द-सृजन की ओर" (http://kkyadav.blogspot.in/) ब्लॉग लिखते हैं, वहीं डाक विभाग को लेकर "डाकिया डाक लाया" (http://dakbabu.blogspot.in/) नामक उनका ब्लॉग भी चर्चित है। श्री यादव का पूरा परिवार ही हिंदी ब्लॉगिंग से जुड़ा हुआ है।

वर्ष 2015 में हिन्दी का सबसे लोकप्रिय ब्लाॅग 'शब्द-शिखर' (http://shabdshikhar.blogspot.com) को चुना गया और इसकी मॉडरेटर आकांक्षा यादव को  हिन्दी में ब्लाॅग लिखने वाली शुरूआती महिलाओं में गिना जाता है। ब्लॉगर दम्पति कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव को  'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दम्पति',  'परिकल्पना ब्लॉगिंग सार्क शिखर सम्मान' के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा नवम्बर, 2012 में ”न्यू मीडिया एवं ब्लाॅगिंग” में उत्कृष्टता के लिए ”अवध सम्मान से भी विभूषित किया जा  चुका  है। इस दंपती ने वर्ष 2008 में ब्लाॅग जगत में कदम रखा और  विभिन्न विषयों पर आधारित दसियों ब्लाॅग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लाॅगिंग की तरफ प्रवृत्त किया और अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ ब्लाॅगिंग को भी नये आयाम दिये।

नारी सम्बन्धी मुद्दों पर प्रखरता से लिखने वालीं आकांक्षा यादव का मानना है कि न्यू मीडिया के रूप में उभरी ब्लाॅगिंग ने नारी-मन की आकांक्षाओं को मुक्ताकाश दे दिया है। आज एक लाख से भी ज्यादा हिंदी ब्लाॅग में लगभग एक तिहाई ब्लाॅग महिलाओं द्वारा लिखे जा रहे  हैं। बकौल आकांक्षा, ये महिलाएं अपने अंदाज में न सिर्फ ब्लाॅगों पर सहित्य-सृजन कर रही हैं  बल्कि तमाम राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक मुददों से लेकर घरेलू समस्याओं, नारियों की प्रताड़ना से लेकर अपनी अलग पहचान बनाती नारियों को समेटते विमर्श, पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण से लेकर  पुरूष समाज की नारी के प्रति दृष्टि, जैसे तमाम विषय ब्लाॅगों पर चर्चा का विषय बनते हैं।

ब्लॉगर दम्पति यादव की 9 वर्षीया सुपुत्री अक्षिता (पाखी) को भारत की सबसे कम उम्र की ब्लॉगर माना जाता है, जो कि वर्तमान में हैप्पी आवर्स स्कूल, जोधपुर में कक्षा 4 की छात्रा हैं। अक्षिता की प्रतिभा को देखते हुए भारत सरकार ने  वर्ष 2011 में उसे "राष्ट्रीय बाल पुरस्कार" से सम्मानित किया, वहीं पिछले वर्ष अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्री लंका में उसे  "परिकल्पना कनिष्ठ सार्क ब्लॉगर सम्मान" से भी सम्मानित किया गया। इसके 'पाखी की दुनिया'  (http://pakhi-akshita.blogspot.in/) ब्लॉग को 100 से ज्यादा देशों में देखा-पढा जाता है और लगभग 450 पोस्ट वाले इस ब्लॉग को 260 से ज्यादा लोग नियमित अनुसरण करते हैं।

हिंदी ब्लॉगिंग की दशा और दिशा पर पुस्तक लिख रहे चर्चित ब्लॉगर कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि,  आज हिन्दी ब्लाॅगिंग में हर कुछ उपलब्ध है, जो आप देखना चाहते हैं। हर ब्लॉग का अपना अलग जायका है। यहाँ खबरें हैं, सूचनाएं हैं, विमर्श हैं, आरोप-प्रत्यारोप हैं और हर किसी का अपना सोचने का नजरिया है। तेरह सालों के सफर में हिंदी ब्लागिंग ने एक लम्बा मुकाम तय किया है। आज हर आयु-वर्ग के लोग इसमें सक्रिय हैं, शर्त सिर्फ इतनी है कि की-बोर्ड पर अंगुलियाँ चलाने का हुनर हो ।










बुधवार, 20 अप्रैल 2016

शाबास दीपा कर्माकर : ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला जिमनास्ट बनीं

मन में हौसला हो तो सब कुछ सम्भव है। इसे चरितार्थ कर दिखाया है त्रिपुरा की 22 वर्षीया दीपा कर्माकर ने, जो ओलम्पिक के लिए क्वालिफाई करने वाली पहली भारतीय महिला जिमनास्ट बन गई हैं। अब वह रियो  डि जनेरियो ओलिंपिक में जिम्नास्टिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी। पहली भारतीय महिला के अलावा वह 52 साल लंबे अंतराल बाद खेलों के महासमर के लिये क्वालीफाइंग करने वाली पहली भारतीय जिमनास्ट भी हैं। देश को स्वंतत्रता मिलने के बाद 11 भारतीय पुरुष जिमनास्ट ने ओलंपिक में शिरकत की थी, जिसमें से दो ने 1952, तीन ने 1956 और छह ने 1964 में भाग लिया था। लेकिन वह ओलंपिक के लिये क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला जिमनास्ट हैं। 18 अप्रैल को इस इतिहास को रचने वाली दीपा को रियो ओलंपिक के लिये क्वालीफाई करने वाली महिला कलात्मक जिमनास्ट में व्यक्तिगत क्वालीफायर की सूची में 79वीं जिमनास्ट सूचित किया गया है।

ओलंपिक के लिए क्‍वालिफाई करने के कुछ ही घंटों बाद दीपा ने रियो ओलंपिक खेलों की परीक्षण प्रतियोगिता में वाल्टस फाइनल में गोल्ड मेडल जीता। 22 साल की दीपा 14.833 प्वॉइंट के अपने बेस्ट प्रदर्शन के साथ महिला वाल्टस फाइनल में टॉप पर रहीं। दीपा ने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए कड़ी मेहनत की। दीपा के पिता दुलाल कर्माकर इस बात को लेकर परेशान थे कि दीपा को बंगाली मीडियम स्‍कूल में पढ़ाएं या फिर अंग्रेजी स्‍कूली में। उनकी इस दुविधा को भी दीपा ने ही दूर किया था। दीपा ने पिता से कहा था कि अंग्रेजी स्‍कूल में जाऊंगी तो जिम्‍नास्टिक की प्रेक्टिस नहीं कर पाऊंगी। उस समय दीपा की उम्र महज सात साल की थी। इस वजह यह थी कि बांग्‍ला स्‍कूल जिम्‍नास्टिक्‍स हॉल का उपयोग करने की इजाजत देती थी। दुलाल कर्माकर बताते हैं कि,’हम परेशान थे कि हम उसे अंग्रेजी से दूर रखकर सही कर रहें है या नहीं। लेकिन वह जिद पर अड़ी रही।’ उनके पिता के अनुसार अंग्रेजी सीखने का मोह छोड़कर दीपा ने सबसे बड़ा त्‍याग किया। 

अभी राजनीतिक विज्ञान में मास्‍टर्स कर रही दीपा  शुरुआत के दिनों में दीपा जिम्‍नास्‍ट को लेकर अनमनी थी। वह एक ही स्‍टेप बार-बार करके खुश नहीं थी लेकिन उसने खेल को नहीं छोड़ा। दीपा के पिता भारतीय खेल प्राधिकरण में वेटलिफ्टिंग के कोच हैं। वे कहते हैं’वह जिद्दी थी। अगर उसने ठान लिया कि कुछ पाना है तो उसे पाए बगैर वह बैठेगी नहीं। पहले नेशनल चैंपियनशिप, फिर इंडिया टीम, फिर कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स और अब ओल‍ंपिक।’ ओलंपिक के लिए क्‍वालिफाई करने के बाद दीपा ने घर पर मैसेज भेजा,’ हम क्‍वालिफाई हो गया।’ ओलंपिक क्‍वालिफिकेशन के लिए दीपा ने अक्‍टूबर और अप्रैल में हुए नेशनल चैंपियनशिप्‍स को भी छोड़ दिया। 2010 दिल्‍ली कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में पदक न जीत पाने के बाद दीपा कई दिनों तक रोती रही थी। 2014 में पदक जीतकर उसने पिछली बार की गलती की भरपाई की। 
-आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर